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अनंत को लेकर-आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi
अनंत को लेकर
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( ४ )
शायद , तुम्हें पता हो
शायद ,न भी — लेकिन जब
तुम — मेरे लिए अपने दरवाजे खोल रहे थे
तब न जाने कब — मुझे तुम्हारी अंगुलियों का
हल्का – सा स्पर्श मिला था
तब से उस छुअन को
हर जगह महसूस कर रहा
भर रहा रेगिस्तानों में लहलहाते मरुद्यान
उछालता फिर रहा उदास चेहरों पर कहकहे
और पतझर से लुटे
वनों में बसंत
अब मैं भी अनंत हो चुका मेरे अनंत !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
आज अपभ्रंश के प्रसिद्ध कवि विद्यापति की पंक्तियां स्मरण हो रही है — ” राधा – राधा रटइत – रटइत राधा भेलि मधाई ” अर्थात राधा का स्मरण करते -करते माधव स्वयं राधा बन गये ।यह प्रेम का रुपान्तरित है । जहां प्रिय सायुज्य में खुद को भूल कर खुद ही प्रिय और प्रिया बन जाता है ।यह प्रेम की पराकाष्ठा है । वह अवस्था है जहां प्रिय और प्रिया का अस्तित्व अलग – अलग या भिन्न नहीं रहता ।इसी तरह की प्रथम दृष्टि प्रेम राम और सीता के गौरी पूजन के समय जनक पुरी में लतान्तरण के बीच सीता में प्रेम के उदय की स्थिति का चित्रण गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया है । यह प्रथम अनुभूति है प्रेम के उदय की जब प्रिय और प्रिया दोनों अनजान हैं ।अजनबी है लेकिन रुप दर्शन ,स्पर्श, गुण कथन , आदि से नायक और नायिका में प्रेम की अनुभूति पैदा होती है । प्रेम फिर परवान चढ़ता है ।यह अनुभूति मय प्रेम ही वह चेतना है जो मनुष्य के मन में उत्साह भर देता है ।सारा संसार प्रेम मय महसूस होता है । जहां कुविचार और कपट ,छल, विकृति नहीं पनपती है । जहां हर समय प्रेम रुपी बसंत लहलहाता है और सूखी धरती भी हरी हो जाती है । चेहरों पर बसी उदासी कहकहों में बदल जाती है ।यह प्रेम का ही असर होता है ।प्रेम सर्व व्यापी है ।प्रेम का पात्र कोई भी हो सकता है । प्रेम करने के लिए यौवन ,धन, या उम्र का होना जरुरी नहीं होता वरन मन में संसार भर के लिए प्रेम के उदय की स्थिति का होना जरुरी होता है ।वह दृष्टि होनी जरुरी है जब किसी में अपने प्रेम की दशा पल्लवित होती महसूस हो ।प्रेम का अहसास ही तो है उसमें डूब जाना ।यही अवस्था है रटइत ,रटइत की अवस्था ।कितनी दृढ़ता है इसमें कि अब मैं भी अनंत हो गया हूं । क्योंकि जब प्रेम मन जन्मेगा तब मनुष्य का अन्त नहीं होगा वह भी अनंत हो जायेगा ।प्रेम के अनंत में डूब कर अनंत हो जाना ही तो अमरत्व है । यही तो प्रेम की चेतना है ।यही तो संवेदना है ।यही सत्य है ।यही विवेक है ।यही करुणा है ।अंत को अनंत में बदलने वाला तत्व है प्रेम ।नफरत मनुष्य की मृत्यु है । घृणा विकार है ।रोग है ।शोक है ।प्रेम अनंत है ।यह जीवन का अनवरत क्रम है । यह जीवन का आनंद और रस है । प्रेम सर्व व्यापक अनुभव है ।लोक ग्राही है । 🙏 विनीता रघुवंशी

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