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अनंत को लेकर
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( ५ )
मैंने जो फूल तुम्हारे लिए तोड़े थे
उनकी महक मेरी हथेलियों के
हर रंध्र में समाई है
अब तुम्हारी वेणी और मेरी हथेलियां
एक जैसी महक रहीं —और
हमारे मन में महासागर की लहरें
उठ – उठ कर बहक रही हैं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — “ आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी श्री राम के वनवास के समय का एक प्रसंग चित्रित करते हैं कि श्री राम ने स्फटिक की शिला पर सीता जी को बैठाया हुआ है और श्री राम उनका फूलों से श्रृंगार कर रहे हैं ।उसी समय जयंत सीता जी के पैर में चोंच मारकर उड़ जाता है ।किन्तु यह प्रसंग अन्य है ।सिर्फ माता सीता का फूलों से श्रृंगार का प्रसंग ही माकूल है ।प्रिय अपनी प्रिया का मनचाहा श्रृंगार करना चाहता है और इसके लिए प्रकृति से उपहार में मिले पुष्प ही कोमल और सुगंध से भरे हैं । यहां कृत्रिम साधन से सौन्दर्य नहीं बढ़ाया जा रहा । यहां तो सौन्दर्य को सौन्दर्य से निखारा जा रहा है ।स्त्री स्वयं प्रकृति का सबसे सुन्दर तत्व है ।वह भौतिक भी है और नैसर्गिक भी । यहां नैसर्गिक वस्तु से मानवीय सौन्दर्य का रुप निखारा जा रहा है ।फूल तोड़ना एक दम सामान्य क्रिया है लेकिन अपने प्रिय पात्र के लिए यह कर्म करना एक विशिष्ट कर्म और हेतु हो जाता है । फूलों की महक केवल वेणी को ही नहीं महका रही वरन वह तो हथेलियों को भी महका रही है ।किसी भी तरह का अच्छा और श्रेष्ठ काम हमेशा मन ,आत्मा और तन तक के भीतरी बदलाव को सहज ही महसूस होने लगता है । फूल तोड़ना एक मामूली कर्म है लेकिन प्रिया की वेणी में उन्हें गूंथा जाना एक विशेष क्रिया बन जाता है ।सुगंध केवल वेणी तक ही नहीं वरन वह आत्मा तक पहुंच कर प्यार और प्रेम की अवस्था को प्रगाढ़ बना देती है । केवल फूलों की महक ही नहीं बढ़ती वरन वह परस्पर प्रिय और प्रिया के बीच प्रेम के महासागर की लहरों भरी भावनाओं को उत्साह ,उमंग, और आत्मीयता से सराबोर कर देती है ।यह वेणी में सजाये गये पुष्प ही तो वह लहर है जो प्रेम की अनुभूति को गहरा और गहरा कर देती है । सुमन यह तो है ही गंध युक्त और प्रेम की अनुभूति के लिए ,सज्जा के लिए इनका उपयोग हथेलियों तक को महका देता है ।इस अहसास का ही दूसरा नाम प्यार ,प्रेम, और प्रणय है ।इसमें स्वत: नैसर्गिक सुगंध बसी होती है लेकिन एक दूसरे के ध्यान और सौन्दर्य की वृध्दि के लिए किया गया कार्य हर हमेशा परस्पर असर छोड़ता है ।श्री राम भी जब सीता जी को स्फटिक शिला पर बैठा कर वनवास की दशा में भी प्रकृति के सौन्दर्य को महसूस करने ,अनुभूति करने के लिए लालायित होते हैं तो सामान्य मनुष्य वेणी के लिए फूल तोड़ कर अपने प्रेम को प्रकट करता है तो यह तो खास हो ही जाता है । फूलों से केवल वेणी या जूड़ा ही नहीं महकता हथेली तक सुगंध से अछूती नहीं रहती ।प्यार का इतना अनुभूति भरा चित्रण कविता को बहुत ही अनूठा और अद्भुत बना देता है ।
विनीता रघुवंशी
