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अनंत को लेकर-आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi
अनंत को लेकर
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( ६ )
देखो, ये तमाम मौसमी बादल छंट गये — और
और शरद दूध से नहा – नहा कर
रंगीन तौलिया लपेटे
शरारती बना — चाहे जहां
चाहे जिसे छेड़ता
बेधड़क घूम रहा
चांदनी में ये रात – रात भर आकाशगंगा की
सैर करता और भोर होते – होते
फूलों की पोशाक पहने
वनांगनो में पांव धरता है
ऐसे में तुम ,किसका स्वेटर बुन रहे हो ?
आओ ,पहले हम जल्दी – जल्दी इस सुबह
ऊन – सी मुलायम किरनों की मच्छियां तो बना लें
और गा लें अपनी सलाइयों पर
ढाई आखर वाला कोई गीत
ताकि हम जो भी बुनें उसमें वो ही वो सुनें ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
आज की भोर कबीरदास जी का पद स्मृति में घूम रहा है —” झीनी -झीनी बीनी चदरिया , काहे का तागा ,काहे की भरनी ,झीनी – झीनी बीनी चदरिया ” यह कबीर दास की चदरिया है जो प्रेम के तागे से बुनी गई है । कविता में भी भोर की मुलायम किरनों की लच्छियां बनाई जा रही है जिनसे प्रेम के ढाई आखर को बुना जा सके । शरद की निरभ्रता आसमान को स्वच्छ बना चुकी है ।बरखा बीत गयी और ऋतु परिवर्तन हो गया है ।हल्की सर्दी मौसम में छा गई है ।मौसम और मिजाज दोनों रंगीन हो चुके हैं ।शरद ऋतु में बसंत के आगमन की सूचना है और बसंत की बहार का स्वागत फूल अपने खिलने से कर रहे हैं ।शरद का कविता में मानवीयकरण कर दिया गया है । यह ऋतु नहीं वरन लड़कपन में छरहरा जवान बेधड़क याने निर्भय , बिना डरे ,छोरा यहां – वहां छेड़ छाड़ करता फिर रहा है । रंगीन तौलिया लपेटे ? फूलों के रंग – बिरंगे रूप को धरे । कोई एक ठिकाना नहीं है ।चाहे जहां ,आकाशगंगा में , वनों में , आंगन में सब कहीं शरद अपना असर छोड़ रहा है ।सब जगह वह निर्भय घूम रहा है । इस माहौल में प्रेम पर ,प्यार पर ,लगाव और आत्मीयता पर तने अनुशासन और मर्यादा के बादल छंट गये हैं इस सब के बीच में अब प्यार के ढाई आखर को बुननें का समय आ गया है ।प्रेम तो खुद में खूब कोमल होता है । भोर की रेशमी मुलायम किरनों की लच्छियां बना कर उन्हें अपनी सलाइयों याने जिन्दगी के करघे पर बुने प्रेम का गीत ! यह गीत ही तो वह बुनाई है जिसमें से केवल वही स्वर फूटे जिसमें प्रेम के बोल पड़े हों , वही ध्वनि ,वहीं स्वर लहरी भरी हो जिसमें से ढाई आखर का राग भरा हो ।यह राग ही तो अनुराग है ।जो कण – कण में है ,जो रोम – रोम में है ।यही स्वर तो सच्चा संगीत है ।यही तो सच्चा गीत है ।जीवन की सही बुनावट है ।कबीर भी बिना तागा और भरनी के हर प्राणी के भीतर यही झीनी – झीनी बुनावट करना चाहते हैं जहां केवल प्रेम की कोमलता हो । नफरत की कठोरता से मुक्त प्रेम का संगीत और गीत । जो मनुष्य बुनेगा वही तो वह सुनेगा ? हम जीवन क्या सुनना चाहते हैं उस स्वर को अपने लिए चुने तब ही तो जीवन रस में कोमलता होगी ,मुलायम होगी ध्वनि , प्रेम की अनंत यात्रा होगी ,तागे कभी टूटेंगे नहीं ।कभी गांठ नहीं होगी ।प्रेम का अनवरत सिलसिला जारी रहेगा ।जैसा बुनेगे वैसा ही सुनेंगे । 🙏 विनीता रघुवंशी

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