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विनीता रघुवंशी
अनंत को लेकर
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( ७ )
खेल ,जो तुम खेल रहे
वह मेरे भीतर भी हो रहा
तुम्हारी उछल – कूद के निशान
मेरी क्रीड़ा- स्थली पर अंकित हैं — और
विजय की किलकारियों से गूंजता हुआ
तुम्हारा स्वर
जहां – जहां भी जाता
वहां – वहां से मुझे
पसीने की आदिम महक आ रही
मैं तुम्हारे संकेतों पर
नहीं चाहता वंशी- सा बजना
सुनना चाहता
दर्शक दीर्घा से
तालियों की गड़गडाहट का वह स्वर
जिन्हें दिमाग की बजाय दिल बजाता है
और वो
हार – जीत का अंक न हो कर
निरंक बना
सिर्फ खेल ही खेल गाता है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
आज आधुनिकता ने मनुष्य के चारों तरफ एक अन्वी स्पर्धा का रचाव किया है ।जिसमें उलझ कर मनुष्य केवल व्यूह में फंसा एक अजनबी होता है ।वह अपने आपका वजूद ही भूल जाता है ।उसके नैसर्गिक और मानवीय गुणों से अनजान बना वह भटकता है जीवन के चौराहों पर ।भूल जाता है मानवीय पहचान ? वह सब जगह केवल भावनाओं से खेलता है ।वह बुध्दि का उपयोग करता है लेकिन मन के स्पन्दन को सुन नहीं पाता । प्रिया प्रेम के बारे में बुध्दि से विचार कर रही है ।वह आधुनिका है । वह भावनाओं में बहकर कोई ग़लत फैसला नहीं लेना चाहती और प्रिय प्रेम की अनुभूति में गहरा और अनूठा है ।वह दिल से विचार कर रहा है ।प्रेम ,प्यार, लगाव ,ईमान और भरोसे पर टिका होता है किन्तु यहां प्रिया के द्वारा अपनाई जाती सावधानी और सतर्कता खल रही है ।उत्तर और प्रतिउत्तर का खेल चल रहा है ।प्रिया मन ही मन प्रेम की अन्तर अनुभूति को स्वीकार तो कर रही है लेकिन फिर भी भरपूर भरोसा नहीं कर पा रही । यहां महाकवि जय शंकर प्रसाद की कामायनी महाकाव्य का कथानक स्मरण आ जाता है । जहां कामायनी के तीन पात्र बहुत महत्वपूर्ण और जिनके आसपास महाकाव्य का कथानक गूंथा गया है — मनु है ,श्रध्दा है और इड़ा है ।मनु जल प्लावन से बचते हैं फिर उन्हें श्रध्दा का साथ मिलता है जब वे जीवन में स्थिरता का अनुभव करते हैं तो उन्हें इड़ा याने बुध्दि का सहयोग मिलता है ।यह कामायनी की कथा भी आधुनिकता की इसी उहापोह का नतीजा है ।मनु श्रध्दा से उबरते हैं और बुध्दि के पास आते हैं । यहां नायिका भी प्रेम रुपी श्रध्दा और आस्था के साथ बुध्दि का उपयोग कर रही है ।वह समर्पण में जल्दबाजी नहीं करना चाहती ।समर्पण हार है ? समर्पण चेतना है ? भावनाओं के खेल में भी हार और जीत की आधुनिक मन : स्थिति को तौला जा रहा है । प्रेम न तो हार है न जीत है ।वह तो हमेशा स्पर्धा हीन रहा है ।प्रेम की इसी अवस्था को जान लेने की जो मनोभाव है वही तो उच्चाकांक्षा को जन्म दे रही है ।उस चुनाव पर बजती तालियों की गड़गडाहट को सुनना चाहती है ।यह प्रेम की जीत है ,यह प्रेम की नहीं दिल की भावनाओं की स्वीकृति है ।प्रेम ही वह जगह है जहां मनुष्य सभी स्पर्धाओं से मुक्त होता है । वहां न नम्बर वन है न नम्बर थर्ड है । वहां सब अंक अपना अस्तित्व खतम कर देते हैं । यह ही ऐसा भाव तत्व है जहां सारी क्रीड़ाएं आकर अपना अस्तित्व समेट लेती है । यहां बुध्दि की जरुरत नहीं होती बस प्रेम की सर्वाधिकार अवस्था होती है ।अपने प्रिय को पाने की लालसा उसकी सर्व स्वीकृति , सर्वस्व समर्पण की अनुभूति ही प्रमुख हैं ।प्रेम में बुध्दि का कोई काम नहीं होता । वहां तो मानवीय गुणों की प्रधानता होती है — जैसे सेवा ,त्याग, करुणा ,प्रेम, संवेदना, सत्य, निष्ठा, ईमान , कर्म,ज्ञान, चेतना ,आस्था , श्रध्दा , उत्साह ,उमंग ,साहस का होना ही प्रेम है । यही तो स्पर्धाहीन है ।प्रेम में बुध्दि नहीं आत्मा और मन और संत चिद आनंद की अनुभूति ही महत्वपूर्ण होती है ।कामायनी की समस्या भी यही है बुध्दि का प्रभाव बढ़ता है तो श्रध्दा वहां उपेक्षित होती है ।कर्म ज्ञान चेतना आनंद की अवस्था ही वास्तविक प्रेम है न कोई छोटा न कोई बड़ा ? सब समान । यही प्रेम का चरमोत्कर्ष है ।
