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अनंत को लेकर-आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi
अनंत को लेकर
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( ८ )
मुझे ,कुछ भी नहीं चाहिए
न सफेद खरगोश
न काली बिल्ली
न भूरा हाथी –न और कुछ
मुझे तो सिर्फ
तुम्हारी वह नदी चाहिए
जो उदय और अस्त को
अन्त:करण में घोल कर
सुर्ख हंसी बिखेर रही है
मैं इसमें धंस कर
खुद नदी हो जाना चाहता और
खो जाना चाहता
उसके प्रपातों, चट्टानों और टापुओं से
टकरा – टकरा कर
उठने वाली एक – एक लहर में
इसलिए कि– कुछ भी तो
नहीं रखा है —
इस औपचारिकता वाले शहर में
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
अनंत को लेकर लिखी गई प्रेम कविता की आज अन्तिम कड़ी है । समाज हर प्रेम करने वाले हर प्रेमी पर यह शक करता है कि यह प्रेम किसी न किसी वजह से हो रहा है । इस प्रेम में जरुर दैहिक आकर्षण है ,या धन – सम्पत्ति का लालच है , या रुप का लोभ है या अन्य – अन्य कोई वजह या कारण है । लेकिन इस प्रेम की वजह तो वह सभ्यता की रिक्तता है ।वह खाली पन है ।वह लगाव है जिसके कारण आज आधुनिकता के बीच पनपी औपचारिक रिश्ते हैं जिनमें व्यक्ति की सत्ता का कोई मोह शेष नहीं । समाज में जिस तरह से भौतिक जगत का प्रचार और प्रसार हो रहा है उससे व्यक्ति अकेला हो गया है ।उसके इस खालीपन को भरने के लिए आपसी संबंधों में कोई भावनात्मक लगाव नहीं बचा है ।परिवार और समाज में आपसी संबंधों के बीच गहरा भरोसा ,विश्वास की जड़ें खोखली हो चुकी है ।आज आदमी संशय का पुतला बन चुका है ।हर रिश्ता पहले शक की निगाह से देखा जाता है ,परखा जाता है , जांची जाती है नीयत , मिठास के कारण पहचाने जाते हैं ,कसौटी पर खरा पन देखा जाता है उसके बाद मन के दरवाजे खोले जाते हैं ।यह सहज आत्मीयता अनमोल है किन्तु आधुनिकता के भौतिक माहौल ने इस सहजता को छल ,कपट, धोखों , अविश्वास से भर दिया है । इसीलिए अपने प्रेम की सहजता को विश्वसनीय बनाने के लिए सब कुछ स्पष्ट और साफ कर दिया गया है कि इस प्रेम से कुछ नहीं चाहिए । भौतिक कुछ नहीं चाहिए जो कुछ अभौतिक है ।जो कुछ अनौपचारिक है वहीं निर्मल आत्मीयता चाहिए ।वह अनमोल प्रेम चाहते जो बिना लाग – लपेट वाला है । जिसमें कोई किन्तु,परन्तु ,लेकिन नहीं जुड़ा है ।वह खरा पन चाहिए जो केवल प्रेम से परिपूर्ण है ।अन्त: करण की पवित्र नदी में धंस कर खुद नदी की लहर हो जाने की इच्छा कितनी निर्लोभ है । ऐसा वातावरण आज भौतिक संसार में बचा ही कहां है हर मनुष्य आज प्रेम के बदले में बहुत कुछ पाना चाहता है ।अपने पल – पल का हिसाब रखना चाहता है । नंह संसार केवल लेन – देन पर ही टिका है । व्यवहार जगत तो केवल नकल,नकद,और नकली पर भरोसा किये हुए हैं फिर इसमें असली और अनौपचारिक सहज संबंधों का कोई महत्व ही नहीं बचता ? इसलिए यह प्रेम केवल समय व्यतीत करने का माध्यम नहीं वरन अन्त: करण की गहराई से उपजा प्रेम है ।यही समय की मांग है ।भौतिक जगत तो विक्षिप्त मनुष्य की , अकेले खुदगर्ज मनुष्य की ,तनाव और ग्रन्थियो से भरपूर व्यक्तित्व की संरचना में जुटा है ।यह अकेला मनुष्य अपने आप से संघर्ष कर रहा है । यह खुद में जीता और खुद में ही मरता है लेकिन किसी पर भरोसा नहीं करता ? अपने स्वभाव से दूर ,अपनी प्रकृति से दूर अपनी पसंद – नापसंद से दूर , अपने शौक और अभिरुचियों से दूर , केवल खुदगर्ज ,स्वार्थी , लालसाओं से भरे , ललाची मनुष्य ? की संरचना है आधुनिकता । यह भौतिक जगत में जीवित मनुष्य केवल संताप, तनाव, ग्रन्थियो , कुण्ठाओ , रिक्त भावना शून्य मनुष्य ही भौतिक जगत की प्रतिकृति है ।सचमुच शहर में अब कुछ भी नहीं बचा है ? मकान हैं घर नहीं , खाद्य पदार्थ हैं मनुहार नहीं , प्रेम है आत्मानुभूति नदारद , आस्था का पाखंड है आस्था नहीं , जयकारे हैं उनमें सच्ची पुकार नहीं , मनुष्य हैं पर कंकाल की तरह निष्प्राण । यह सब वर्तमान की दशा है । यहां सबसे अमूल्य है तो मनुष्य का मनुष्य से प्रेम ,आत्मीयता ,लगाव , प्यार इसी के लिए भटकता मनुष्य जिसे कुछ नहीं चाहिए बस निर्मल नदी सा बहाव , लहरें उसकी आत्मानुभूति उदय से अस्त तक लहरें ही लहरें आत्मीयता से लबरेज । मनुष्य को ही क्या यह जरुरत तो प्राणी मात्र,क्या जीवमात्र की जरुरत है ये तो ? आदमी को अपने व्यवहारिक जगत पर सोचना – विचारना होगा तब ही वह भौतिक -औपचारिकता के इस दलदल से उबर सकेगा । वस्तुओं का भी एक निरपेक्ष संसार है जहां मनुष्य अपने अस्तित्व को सुरक्षित समझता है लेकिन वस्तुएं आदमी को संरक्षित नहीं करती वरन आदमी ही वस्तुओं का संरक्षण ,संग्रह, और ग्रहण करता है ।यह परिग्रह की वृत्ति ही उसे संसार से निरपेक्ष ,बाहर और अस्तित्व को खतम कर देती है । मनुष्य को प्रेम – तत्व को आत्मीय ,और अन्त:करण में महसूस करना चाहिए ।यह अनुभूति ही सच्ची और खरी अनुभूति है । यही मनुष्य के अस्तित्व का संरक्षण है । बिना प्रेम तो घट स्मशान समान है ।यह कबीर दास जी भी कहते हैं ।कबीर दास जी ने अपने युग में प्रेम की सामाजिक भूमिका को स्वीकार किया ।वही आत्म स्वीकृति आज की कविता में है । सचमुच प्रेम ने सारे संसार को जकड़ रखा है ।प्रेम से बाहर या मुक्त संसार का संचरण नहीं हो सकता । 🙏 विनीता रघुवंशी

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