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नर्मदा की शाम
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नीबी बंध ढीले किये
पुष्प गंधी सांसें छोड़ती
धारा ,टापू ,वनांगनों और
विन्ध्य – सतपुड़ा की
संवेदनशील घाटियों के
दूरान्तगामी उतार – चढ़ाव तक
रतनार नयनों से
स्वर्णिम रेख-सी खींचती
जंघा तटों की रोमावलियों में
फुरहरी -सी उठाती
एक अभिसारिका चल दी उद्दाम !
नर्मदा की शाम !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में श्रृंगार का सोहाग लिएं प्यार में बेकल नर्मदा अपने प्रिय से मिलने को उद्दाम नायिका बनी नर्मदा की शाम चल पड़ी है ।शाम ढल रही है और इस समय नर्मदा के बहाव को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अभिसार की कामना से एक युवती रुपी शाम अपने प्रिय के करीब जाने की शीघ्रता से दौड़ लगा रही है ।ठण्डी बयार है ।सूर्य अस्ताचलगामी है और सांझ की लालिमा आसमान में स्वर्ण रेखा खींच रही है ।यह नर्मदा का प्रवाह कहीं रुकता नहीं है । नर्मदा अबाध धारा बन बह रही है ,वनों में ,मैदानों में , टापू में , विन्ध्य और सतपुड़ा के पर्वतों का स्पर्श करती बह रही है बिल्कुल कामातप्त प्रिया की तरह उसका यह प्रवाह यह अनुभूति करा रहा है कि रात होने वाली है और प्रिय मिलन की आस से गतिमान त्रिया अपनी गति से तीव्रतर जा रही है ।सांझ के नेत्र लालिमा युक्त हैं ।नर्मदा जल में सूर्य की अस्ताचल किरणें स्वर्ण रेखा खींचती जा रही है ।नर्मदा अपने अभिसार के भाव में निमग्न बह रही है ।सागर से मिलन की इच्छा ने बहाव में गति ला दी है ।यह मोहक नर्मदा के चौड़े पाट का सुदर्शन दृश्य है ।बीतता दिन जिस भाव सौन्दर्य को रच रहा है वह अद्भुत है ।प्रकृति तो सुन्दर है ही उसे आत्म सात करती दृष्टि भी एक अभिनव कोण से कला और कल्पना को नया आयाम दे देती है ।नर्मदा अंचल में नर्मदा को मातृ भाव से ही स्तुत्य माना जाता रहा है लेकिन पहली मर्तबा नर्मदा का अभिसारिका के रुप में सौन्दर्य की अभिकल्पना चित्ताकर्षक बन पड़ी है । नर्मदा की सुबह जितनी सात्विक है ।नर्मदा की शाम उतनी ही उत्तेजक और कामोद्दीपन करने वाली है ।यह नर्मदा के प्राकृतिक सौन्दर्य का ही आकर्षण है कि वह हर प्रहर अपने सौन्दर्य और रुप को बदलती रहती है ।यह प्रकृति की अद्भुत सामर्थ्य का ही प्रमाण है कि सौन्दर्य तो उसके कण कण में निखरता रहता है ।नर्मदा के ढलती सांझ के दर्शन भी बड़े मनमोहक होते हैं ।नर्मदा निरंतर बहती है अपने सौन्दर्य के साथ यौवन बिखेरती हुई ।
विनीता रघुवंशी
