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विनीता रघुवंशी
नर्मदा की सुबह
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कुहरे का धुमैला वस्त्र फेंककर
नींद से उठी सुबह
नहाने चली नर्मदा में धंसकर
पानी के छींटों से
अलसाये तट हड़बड़ा गये
कुनमुनाकर जाग गई ठण्डी रेत
आसमान पर किलोलें करने लगे
चितकबरे हरिण मेघ
असंख्य श्वेत अश्वों वाला रथ
तेजोमय प्रभामण्डल बनाता
हरहराकर चल पड़ा
जिसके स्वागत में
सुबह ने बिछा दिये –असंख्य फूल
फिर आरती का थाल सम्हाले वह
धूप के टुकड़ों से गीली लटें सुखाती
धरा सखी के श्यामल कपोलों पर
गुलाबी चुम्बन रखती —- चल पड़ी जगह – जगह !
नर्मदा की सुबह !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में नर्मदा के तट पर उदित होती भोर का जो चित्रांकन हुआ है वह बड़ा ही मनोहारी है ।नर्मदा की सुबह कविता पढ़ते पढ़ते खुद ब खुद सुबह की क्रिया जैसे –अलसाना ,कुनमुनाना ,उठते समय की स्फूर्ति ,चितकबरे हरिण मेघ ,असंख्य श्वेत अश्वों वाला रथ अर्थात सूर्य का आगमन ,हरहराकर चल पड़ना , पेड़ों में ,पौधों में असंख्य फूलों का खिलना और झरना , फिर आरती -पूजा का पावन भाव ,और अन्त में धूप के टुकड़ों से गीली लटें सुखाती नर्मदा की सुबह हौले हौले चल पड़ी है अपनी श्स्य श्यामला धरती रुपी सखी के कपोलों को चूमती चल पड़ी जगह जगह याने सब जगह सुबह की जागरण बेला की हलचल दिखने लगी ।कितना मनोरम है यह नर्मदा नदी के किनारे की सुबह का दृश्य कितना पावन भाव बोध जगाता सा । यहां सुबह एक युवती बनी सबके बीच से धीरे धीरे उदित हो रही है । सुबह की जिस तरह शुरुआत होती है किसी भी नदी तट पर वह बड़ी ही मोहक है ।उसपर नर्मदा की सुबह में जागरण का धीमा और पावन भाव से उदित होना और भी चित्ताकर्षक है ।कुहरे का धुमैला वस्त्र फेंककर याने जो धुंध नदी के समतल जल पर चादर सी ओढ़ी हुई थी और जब आदमी जागता है तो सबसे पहले वह अपने पर ओढ़ी चादर को हटाकर ही बिस्तर ,शय्या,बिछौना त्यागता है ।रात भर की कुहरे की धुंध भरी चादर को छोड़कर नर्मदा आराम के बाद जाग रही है ।नर्मदा नदी में बहुत से लोग नहाने लगे ।नर्मदा के ,गंगा के, यमुना जैसी पवित्र नदियों पर निवास करते लोगों में ब्रह्ममूहूर्त में स्नान का नियम होता है ऐसे लोग सुबह सुबह ही अपने नित्य कर्म से फारिग होकर अपनी शेष दिनचर्या की शुरुआत करते हैं ।इस तरह का नियम पालन प्रौढ़ होते स्त्री – पुरुष दोनों ही करते हैं और इन्हीं के साथ सुबह भी धंसकर नर्मदा में नहाने लगी ।पानी के छींटों से अलसाये तट अर्थात तट पर रात व्यतीत करते नर्मदा परिक्रमा पर निकले यात्री भी अपनी थकान भूलकर हड़बड़ा गये – ‘अरे सुबह हो गयी ‘ का अस्फुट स्वर तट पर गूंजने लगा । कुनमुनाकर जाग गई ठण्डी रेत यह रेत का जागना का मायना है जो कुछेक लोग रेत में बिछौना बनाकर सो रहे थे वे भी कुनमुनाने लगे ।यह ‘कुनमुनाना’ बड़ा ही सूक्ष्म भाव है जिसे शब्द नहीं दिये जा सकते लेकिन जैसे हाथ पैर सिकोड़ लेना ,मुंह से हल्के हल्के ऊं ऊं ऽ ऽ की ध्वनि उचारना आदि ।आसमान पर धूसर भूरे सफेद बादलों के टुकड़ों का उभरना बिल्कुल ऐसे प्रतीत हो रहे हैं कि हरिण हों ।बस भोर का उजास चारों तरफ फ़ैल गया है क्योंकि असंख्य किरणों के साथ सूर्य उदित हो गया है ।हरहराकर चल पड़ा याने गति वान रुप से सुबह की हलचल शुरु हो गयी ।सूर्य के आते ही उसके स्वागत में पेड़ -पौधे फूलों से भर गये ।कुछेक फूल धरती पर झर गये ।मानो सब सूर्य का स्वागत करने को उमड़ रहे हैं ।प्रकृति कितनी समन्वय शीला है ।सब एक – दूसरे को पाकर हर्षित है ।अब सुबह रुपी किशोरी -युवती आरती का थाल सम्हाले अपनी गीली लटों को धूप के टुकड़ों से सुखाती चल पड़ी ।जगह जगह हर स्थान पर सुबह होने के चिन्ह लक्षित होने लगे ।यह है सुबह की सूक्ष्म -अनुभूति , सूक्ष्म -संवेदन, सूक्ष्म – निरीक्षण ,भाव का संश्लेषण ।सुबह तो सब देखते हैं लेकिन इस तरह सुबह को आत्म सात कर लेना एक एक क्रिया को इस तरह से समेट लेना वाकई अद्भुत है ।सुबह साकार हो कर हमारे आत्मानुभूति का हिस्सा बन जाती है ।सुबह को इस तरह महसूस करना सचमुच अचरज भरा है ।नर्मदा के किनारों पर ये दृश्य बहुत सहज भाव से देखने को मिलते हैं क्योंकि नर्मदा ही ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा ,स्नान ,दर्शन, जिसके कंकर में भी शंकर का वास है इस भाव से नर्मदा का लोक जीवन में पौराणिक आख्यानों में बहुत महत्व है ।
