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विनीता रघुवंशी
यहां जमीन पर
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ओ, सदियों से
सोई घाटियों !
तुम्हारे ऊपर
पत्थरों की
स्याह इबारतों में जो लिखा है
उसे एकाध बार पढ़ तो लो !
कर लो
चाहे जितनी उपेक्षा
किन्तु ये
तुम्हारी ही आवाज की
ठोस शब्दाकृतियां हैं
आवाज जब जम जाती है
घाटी में लुढ़कता हुआ
पत्थर बन जाती है
ओ सदियों से सोई घाटियों !
अपनी जमीं आवाज को पिघलाओ
उसे यहां जमीन पर लाओ
लोगों के बीच – – –
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में उस नागरिक चेतना के बोध की तलाश है जो उसकी अस्मिता और अस्तित्व को ही जड़ बना दिया है ।जन आज चेतना शून्य सा अपनी समस्याओं का हल नेतृत्व के दरवाजों पर दस्तक दे देकर भीख की तरह ,उपकार की तरह मांग रहा है ।यह सब उसके स्थिर और जड़ हो जाने के कारण है ।वह अपने आपको विस्मृत करता हुआ पशुवत जीवन जीने को ही जिन्दगी समझते रहते हैं ।अपना भला -बुरा सब यथास्थिति में ही खोजते रहते हैं ।यही तो चेतना की शून्यता और चेतना हीन हो जाना है । इसीलिए पुकारा जा रहा है — ओ ! सदियों से सोई घाटियों ! ये घाटियां क्या है ? यह जन मन जो मनुष्य होते हुए भी मनुष्य -भाव महसूस नहीं कर रहा है ? ये घाटियां वहीं है जो जीवन के उतार चढ़ाव बड़े यकीन के साथ गुजारती हैं लेकिन दायरे में बंधी हुई ।बिल्कुल क्रिया हीन , बिल्कुल बिना किसी प्रतिक्रिया के जीवन व्यतीत करना ।सब तकदीर का लिखा मानकर सहते जाना । इन्हें यह विस्मृत रहता है कि कर्म से सब कुछ बदला जा सकता है किन्तु यथास्थिति में कैद ये जन मन सदा शून्य में ताकते हुए जीता है ।यह शून्यता में ताकते रह कर जीना विचार शून्य हो जाने की अवस्था है ।यही तो वे भाग्य लेख हैं जो पत्थरों ने घाटियों पर लिख छोड़े हैं ? इन भाग्य लेखों में चेतना छुपी है ।उन चेतना के ,जागृति के शब्दों को बार बार न पढ़कर भले घाटियों की बस्ती अनसुना कर लें लेकिन इन स्वतंत्र चेतना की आवाज को तो अनुभूत करना ही होगा ।जब घाटी में पसरे सन्नाटे के बीच कोई पत्थर लुढ़कता है-तो वह भी एक चेतना का स्वर उचारता है ।यह भय से जमी आवाज को पिघलाने का वक्त है । ओ, घाटियों भय ने तुम्हें जड़ी भूत बना दिया है ।यह भयभीत होकर सिमट जाना अच्छी स्थिति नहीं है ।अपनी भय से घुटती आवाज को सब के बीच फैलाओ यही आवाज तुम्हारे जीवित होने का सही प्रमाण है । जमीं धड़कने ,जमी हुई ध्वनियां , निष्प्राण हो जाने का सबूत है ।अपने आपको विस्मृत करके जीती हुई घाटियों अपने इतिहास को खोलो , पढ़ों,उससे चेतना ग्रहण करो ।यही तो अपने आपसे पहचान बनाने का सिलसिला है । लोगों के बीच आओ ।उसे घाटियों के बीच दबा कर रखने की बजाए यहां जमीन पर लाओ तब ही तुम्हें घुटन से मुक्ति मिलेगी । भय ही बहुत अबूझ घाटी है ।जिसमें आदमी की चेतना लोप हो जाती है ।सही सोचने की स्थितियां गुम हो जाती है । लेकिन जब भयभीत आदमी जन जन के बीच अपनी आवाज बुलंद करता है ।ध्वनि उचारता है तो भयमुक्त हो जाता है ।भय ही घुमावदार होता है ।भय के भीतर से बहुत तरह के भयाक्रांत करने वाले चेहरे और सूरतें निकल निकल कर भय के रहस्य को स्याह और गहरा बनाती जाती है ।आवाज को पिघलाने की दशा ही भय से मुक्त होने की चेतना है ।
