9
विनीता रघुवंशी
क्षितिज बनती पहाड़ी से
********************
उठ पहाड़ी
दो घड़ी हम बात तो कर लें !
जब कभी भी , दृष्टियां जाती तुम्हारी ओर
तब सदा तुम , क्षितिज बनकर रह गई —
मेरे लिए
पार जिसके आज तक
कुछ भी नहीं आया नजर
लो उठो अब हाथ मुंह धोकर
तनिक चैतन्य हो लो
और मेरे साथ डेट कर खिलखिलाती चलो पुल के पार
जहां सूरज धमन भट्टी पर
आदिम सुबह को
अग्नि का स्नान करवाने लगा है
हम वहीं चल कर
सृजन के लिए आकुल
शक्ति की उर्वरा धरा पर
चुम्बनों के बीज बो लें
और उनकी लहलहाती सुर्ख फसलों में
कहीं भीतर पैठ कर
समय का प्रतिपृष्ठ खोलें !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
यदि पहाड़ी मनुष्य बनकर प्रेमिका का रुप धर ले तो क्या ऐसा प्यार मन में उपज सकता है ? मैदान से दूर तक निगाह डालने पर हर पहाड़ी हमें क्षितिज की तरह याने धरती का एक छोर बनती ही दिखती है और जब आदमी इस क्षितिज बनती पहाड़ी के नजदीक पहुंचता है तो वह समतल दिखने लगती है ।यह समतल भाग पूरी तरह निस्तब्ध होता है ।लगता है मानो पहाड़ी युगों युगों से एक ही जगह अलसाई सी स्थिर सोई पड़ी है ।किसी ने इस पहाड़ी को जो धरती का छोर सी दिखती है उसे जगाया ही नहीं ।उस से बात ही नहीं की ,क्योंकि वह मैदान के पार बहुत दूर दिखाई देती हैआज तक कोई उसके पास पहुंचा ही नहीं ।जब जब भी आदमी ने सूदूर मैदान के छोर तक अपनी दृष्टि डाली तो वहां केवल धरती और आकाश का मिलन बिन्दु बना क्षितिज ही दिखाई दिया ? किसी ने क्षितिज तक पहुंचने की कोशिश ही नहीं की ।आज क्षितिज बनती पहाड़ी तक पहुंच कर उसकी चैतन्य अवस्था को जानने का प्रयास किया है तो लो उठो ! हाथ – मुंह धोकर तनिक चैतन्य हो लो ।बरसों से अलसाई पड़ी पहाड़ी पर हलचल और गतिविधियों के रास्ते बनाने पर उसे पुल पार कराया जा रहा है यह पार जाना पूर्व दिशा की ओर है जहां आदिम सुबह का सूरज दिन को अग्नि स्नान करवा रहा है ।सच है सूर्य उदित हो चुका है दिन पहर – दर – पहर आसमान में चढ़ रहा है ।हम उसी क्षितिज तक चल कर धरती पर सृजन के लिए व्याकुल शक्ति की उर्वरा धरा पर चुम्बनों के बीज बोना मतलब इस ऊसर क्षितिज पर सृजन के प्रयास की शुरुआत करना ।यह श्रृंगार की रुमानियत नहीं वरन श्रम सीकर से सृजन करते इरादे हैं जो मनुष्यता की बेहतरी की उम्मीद से भरपूर है ।ये फसल है उन आशाओं की जो सक्रिय हैं सकारात्मकता के लिए ।ये वे पन्ने हैं जिन पर आदमी अपने हित का नक्शा उकेरने को तत्पर है ।समय का प्रतिपृष्ठ अर्थात अपनी चेतना अपनी बुध्दि अपना विचार अपनी करुणा के नये पन्ने रचे जायें यही तो नये चुम्बन है धरती पर क्षितिज बनती पहाड़ी पर ।आदमी की शक्ति की वास्तविकता तो सृजन में है ध्वंस तो शक्ति नहीं विकार है ।शक्ति का सात्विक रुप ही सृजन का माध्यम है।निस्तब्ध क्षितिज भी बदले जा सकते हैं जरुरत है दृष्टि के बदलाव की ।क्षितिज बनती पहाड़ी ही आदमी के कर्मशील श्रम और स्वप्नों के रचाव की सच्ची फसल है ।धरती का अन्तिम छोर नहीं है क्षितिज ।क्षितिज में भी रचाव की असंख्य संभावनाएं सहज ही गतिशील रहती है ।
