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कब समझोगे विंध्याचल ?
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हिमालय के पक्ष में खेले गये
अगस्त के उस नाटक को
कब समझोगे विंध्याचल ?
प्रणति मुद्रा में झुके
कब सोचोगे
उन ज्वारों के बारे में
जो बार -बार
भीतर तक झकझोरते रहते हैं तुम्हें ?
क्या —
अपनी छाती से चिपकी
अण्डे सेती टिटहरियों की
करुण टिटियाहट
नहीं सुनाई देती तुमको !
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता पौराणिक संदर्भों और अन्तर कथा के प्रसंग को समेटे हुए है ।हिमालय यहां सत्ता और शक्ति का प्रतीक है ।हिमालय के पक्ष में अगस्त ऋषि ने विंध्याचल को झुक कर मार्ग देने का आदेश दिया और हिमालय की ऊंचाई के सामने ,शक्ति के सामने और महत्ता के सामने विंध्याचल ने अपने को नत मस्तक किया ।कहा जाता है कि —आज तक विंध्याचल उसी नत शीश मुद्रा में खड़ा है ।सागर उसके आसपास गर्जना कर रहा है ।उसमें “ज्वारों ” याने विचारों का संघात होता है ।यह प्रणति मुद्रा में सर्व सामान्य जन है जो विंध्याचल के झुक जाने से अपनी अस्मिता , अपनी प्राण – रक्षा के लिए विंध्याचल की पहाड़ियों और उसकी ऊंचाई पर निर्भर है । इसीलिए सामर्थ्य वान विंध्याचल से प्रश्न किया जा रहा है कि तुम सत्ता रुपी हिमालय के सामने कब तक झुके रहोगे ? कब तक सत्ता को प्रणाम करते रहोगे ? तुम्हारा यह प्रणति भाव सर्व जन के लिए आपदा कारी है ।कब समझोगे अपने सामर्थ्य को ? कब तक गुरु आज्ञा का पालन करते हुए सर्व जन को संकट और संघर्ष मय जीवन व्यतीत करने के लिए विवश करोगे ? तुम अगस्त ऋषि और हिमालय की सांठ गांठ के खेल को कब समझोगे ? तुम हिमालय से अपना कद ऊंचा न कर लो इसीलिए तो हिमालय ने अगस्त ऋषि का सहारा लिया और तुम्हें प्रणाम मुद्रा में झुका कर हिमालय तुमसे ऊंचा हो गया ? यह खेल है सत्ता का इसे कब समझोगे कि विनम्रता का भी एक वैचारिक स्तर होता है ।प्रणाम की भी रीति – नीति होती है ।यह सामान्य शिष्टता का भाव तुम कब समझोगे विंध्याचल ? केवल प्रणति भाव से ही सत्ता की ऊंचाई नहीं बढ़ाई जाती वरन जो हमारी जिम्मेदारी है जो सर्व जन हम पर निर्भर है उनकी करुण पुकार को सुनना समझना भी बेहद जरुरी है ।अपने समर्पण भाव को जन हितकारी बनाना होगा ।हर समय झुका हुआ या नतशीश मुद्रा कारगर परिणाम नहीं देती कभी कभी करुण स्वर के साथ तन कर भी खड़ा होना होता है ।यह बात हर दृढ़ चरित्र व्यक्ति को समझना -बूझना जरुरी है ? यहां विंध्याचल और हिमालय के बीच के सूत्र बने अगस्त ऋषि की भूमिका पर भी विचार का केन्द्र स्थिर किया जा सकता। हैं जो स्पष्टतः: राजनीति के दुष्चक्र को प्रकट करता है ।यह है पौराणिक व्यवस्था का स्वरुप जहां कद की ऊंचाई सामर्थ्य ,चेतना ,विवेक, संवेदना ,विचार को नत शीश करके अपने अस्तित्व की ऊंचाई स्थापित करने का प्रयास प्रतीत होता है ।क्या यह हिमालय और विंध्याचल प्रतीक नहीं है आज की राजनीतिक व्यवस्था के परिदृश्य को उजागर करने के लिए ? विचार तो विवेक के अधीन है ।जिसकी चेतना विवेक के द्वार खोले हुए हैं उसके पास विचार की शक्ति स्वत: खाड़ी होगी ।
विनीता रघुवंशी
