12
बेटी को
*******
पिछला सबक दुहराते हुए
बेटी ने पूछा —
गार की रंभाहट
शेर की दहाड़
सारस की क्रेंकार वगैरह तो
समझ में आ गई
आदमी की बोली को क्या कहते हैं पापा ?
मैंने कहा -बेटी !
उसे भाषा कहते हैं
तो सभी लोग
एक जैसी भाषा क्यों नहीं बोलते ?
आदमी चतुर होता है
वह अपने ज्ञान को
अपनी बोली में ढोता है
तो क्या आदमी की भाषा
ज्ञान की टार्ली है ?
बेटी को कैसे बताऊं
कि आदमी की भाषा
एक पहेली हैं –एक भूख है
जिसे बुझाना एक ख़तरनाक काम है
और जो ताकीद की गई है
उसके अलावा
कुछ भी सिखाने की
सख्त मुमानियत है मुझे !
अब मैं ध्यान बंटाने के लिए
अपनी बेटी को
पहाड़ की तरफ ले जाता हूं
जहां —-
कित्ता -कित्ता पानी —का
जवाबी घेरा बना नाच रहे हैं कुछ बच्चे
एक पहाड़ी तालाब के पानी में
रानी बिटिया गोले के बीचोंबीच
माथे- माथे पानी—- बताने के बाद
चना चुप्प ,गड़ा गुप्प —-हो जाती है
मैं चुपचाप
देखता रहता हूं उसे
पानी में गहरे और गहरे
सरक कर डूबती हुई ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में बचपन में माता – पिता की जो भूमिका होती है वह संसार में जीवन संघर्ष को जाने -समझने की सीख देने का दायित्व होता है । लेकिन सीख और शिक्षा और ज्ञान देने के बाद भी जब बेटी सयानी होती जाती है तो उसका वास्तविक चेतना रुप याने मनुष्य होने की स्थितियां उसके आसपास से सिमट जाती है ।वह केवल एक स्त्री या महिला बनाकर समाज उसके साथ मानवीय व्यवहार भी नहीं करता ।उसके आसपास निर्दयता की स्थितियां और बर्बरता की दशा घुमड़ने लगती है ।जिसमें वह अपना हाल सुनाते सुनाते गड़ा गुप्प हो जाती है ।कविता मर्म स्पर्शी हो गई है ।समाज में स्त्री की दशा बताने के लिए—‘ कित्ता कित्ता पानी ,गोल गोल रानी ‘ के बालसुलभ खेल को माध्यम बनाया गया है ।सवाल तो आदमी की भाषा पर है जिसमें स्वार्थ सिध्दि के लिए शब्द हैं ,भरोसा जमाने के लिए शब्द और अर्थ दोनों हैं जिनका इस्तेमाल आदमी अपने लाभ – लोभ के लिए करता रहता है ।उसके शब्दों में तर्क है ,स्नेह है, लगाव है ,प्यार है ,गुस्सा है, ताड़ना है ,तनाव है , आक्रोश है ,आक्रमण है , भेद है ,चाटुकारी है ,चापलूसी है , भ्रम है तो सत्य भी है । इसीलिए तो बेटी को बस यही सिखाया कि —-“आदमी चतुर होता है “।आदमी की भाषा भूख की भाषा है ।जैसी भी भूख हो भाषा भी वैसे ही बाना और स्वाद लेकर उतर आती है जुबान पर भूख के मुताबिक ।आदमी के मन में धनालोभ हो तो ,पद की भूख हो तो ,यश और कीर्ति पाने की भूख हो तो ,ज्ञान की भूख हो तो , संसार विजय की भूख हो तो , आदमी अपनी भूख की जरुरत के हिसाब से अपने शब्द अपने अर्थ गढ़ता रहता है ।भाषा का इस्तेमाल भी वह अपनी इच्छापूर्ति के लिए करता है। यही ज्ञान तो वह संसार साधन के रुप में अपनाता है और अपने इस सीमित ज्ञान को वह पीढ़ी दर पीढ़ी परस्पर सौंपता रहता है । यह ज्ञान की वह दशा है जो आदमी को डूबने से रोक नहीं पाती बल्कि मूक दर्शक बनी यह ज्ञान की अवस्था सरक कर डूबते जाने को देखती है क्योंकि स्त्री का डूबना मानव समाज की हानि और नुकसान से परे है ।उसने स्त्री और पुरुष में चेतना गत भेद गढ़ रखा है ।यदि वास्तव में समाज अपना हित करना चाहता है तो उसे स्त्री के अस्तित्व को बचाने के लिए नये शब्द ,नयी चेतना और नयी भाषा गढ़नी होगी ।स्त्री की अस्मिता से खिलवाड़ करना छोड़ना होगा ।कविता अपने भीतर से उस बेटी के लिए सोई हुई करुणा को जगाने की कोशिश है जिसमें समाज चुपचाप बेटी के बताने पर भी कि कित्ता कित्ता पानी माथे तक आ चुका है चुप है । बेटियां सरक कर हालातों में डूब रही है और समाज निश्चेतन सा उसे चना चुप्प गढ़ा गुप्प होते देख रहा है ।क्या ये स्थिति सामान्य कहीं जा सकती है ? स्त्री भी समाज का चेतन और मानवीय हिस्सा है ।उसकी भूख ,प्यास, आराम , स्वास्थ्य सब बहुत मायने रखता है ।वह भले पुरुषों के समान युध्द नहीं जीत कर लाती है और न संग्राम ही लड़ती हैं, न वह पूंजीगत लाभ जुटाती है लेकिन वह पुरुष की सम्पदा का संरक्षण ,व्यवस्था ,प्रबन्धन तो जी जान और प्राणपण से करती है क्या यह दायित्व निर्वहन कम है ? जिस तरह से समाज स्त्री जीवन की भरसक उपेक्षा करता है वह अक्षम्य अपराध ही माना जायेगा ? स्त्री को स्वयं अपने अस्तित्व और मानवीय चेतना के प्रति सचेत रहना चाहिए ।स्त्री यद्यपि कोमल है ,लावण्य मयी है , ममता शील है किन्तु वह दृढ़ चरित्र भी है ।यह स्वीकार समाज को करना ही होगा ।यह भी तय करना होगा कि वह बेटियों के लिए गड़ा गुप्प चना चुप्प की स्थितियों को भाषा और शब्द उसके भीतर मायने की आवाज भी प्रस्फुटित करेगा ।
विनीता रघुवंशी
