9
परेड ग्राउण्ड पर —१
*************
देश ! सावधान!
कुछ भी हरकत नई ( नहीं ) करेगा
कुछ भी सोचेगा समझेगा नई
भाई चारे की नई दिखायेगा शान !
देश ! सावधान !
कुछ भी देखेगा नई
कुछ भी सूंघेगा नई
कुछ भी सुनेगा नई
सीधे सट्टा रखेगा —
आंख नाक कान ! देश सावधान !!
दोनो हाथ
खाली मुट्ठी बांधें ं
अपनी जांघों से सटाते रखेगा
ढीला ढस्स नई रखेगा
सामने देख !
कांठी कसे घोड़ें सा टेड़ाकट ।
गर्दन ठीक से तान !
परेड ! मार्चिग शुरु करेगा
शुरु कर !
एक दो -एक -दो -दायां बायां
एक दो
ढिलंगढ़ा नई रखेगा
एक दो होता चल
कभी अपनी लकीर नहीं छोड़ेगा
लकीर का फकीर बना रहेगा
एक दूसरे से
मेल मिलाप नई करेगा
एक दूसरे के पास
कभी जायेगा नई
तीन – चार – पांच -छै
सात – आठ – नौ – दस
बस बस बस बस
विश्राम !
सावधान !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत लंबी कविता—-” परेड ग्राउण्ड पर ” का अंश -१ )
वर्तमान समय में जो हमारे देश की दशा है और जिस दिशा में जाने का रास्ता साफ किया जा रहा है ।वह संकेत कविता में सेना के काॅशन याने आदेश पद्धति में आम जन को दिये जा रहे हैं । क्या हम सचमुच राजनीतिक दृष्टि से इसी दशा की ओर बढ़ रहे हैं ? यह सोचने का प्रश्न है ? देश को आज सावधान हो जाना चाहिए ? क्या सचमुच हमारे अपने आंख कान नाक पर आज सत्तातंत्र का वंश चलाया या रहा है ।जो सत्ता अपने प्रचार तंत्र से हमें दिखाना चाहती है जनता वहीं देख रही है ।स्याह को रुपहले पर्दे पर रंगीन और चमकदार करके प्रसारित किया जा रहा है तो उसी को देखने को विवश हैं ।जिस धर्म को जन जन के बीच बिखेरा जा रहा है उसी की गंध से देश आज गफलत में सांस भर सुगंध से भरपूर है ।आज नफरत की बांस से जन जन की नाक दुर्गंध युक्त है ।सत्ता जनता के लिए कैसे कैसे निर्देश जारी कर रही है ।इस कविता में देश की तमाम स्थितियां नाटकीय ढंग से उकेरी गई हैं ।निर्देश भी सर्वनाम में है पूरे देश के लिए हैं ।पूरे देश को सावधान किया जा रहा है किसी एक वर्ग जाति समुदाय किसी को नहीं ।सत्ता के षड्यंत्र से समूचे देश को रक्षित करने की फिक्र है ।सत्ता ने अपने व्यूह में सत्ता के उन सभी उपक्रमों पर ,विभागों पर ,न्याय व्यवस्था पर , रोजगार पर ,संस्थाओं पर जिनसे लोकतंत्र की पहचान और परिचय होती थी उन सभी पर नियंत्रण करके उनकी स्वायत्त स्थिति और दृढ़ता को शिथिल और भ्रष्ट कर दिया है । देश के ऐसे हालात में जनता की पहली जिम्मेदारी तो अपने देश भाव को बचाने का है । इसीलिए आज देश को सावधान किया जा रहा है ।देश को सावधान किस दिशा में किया जा रहा है यह ध्यान देने की बात है ।देश सावधान कोई हरकत नहीं करेगा ? याने बदलाव का विचार मन में उभरने नहीं देना है ? क्या यह संभव है एक चेतना शील समाज से ? कुछ सोचेगा समझेगा नहीं ? याने अपने मस्तिष्क के सभी हिस्सों को विचार करने की प्रणाली ही ठप्प कर लेगा ? जब कि आदमी आदमी से हर बात में यही कहता है –“तुम्हें सोचना तो था ? याने आदमी यदि है तो उससे सोचने की उम्मीद तो की ही जायेगी ? पर सत्ता ने समूची जनता के विचार तंत्र को अपने प्रचार तंत्र से प्रभावित कर लिया है। इसीलिए बार बार देश को चेतावनी दी जा रही है ।यह चेतावनी सत्ता जनता को अपने नियंत्रण के लिए दे रही है ।जनता कुछ भी न देखेगी,न सूंघेगी नहीं, कुछ सुनेगी नहीं ,गर्दन ठीक से ताने रहेगी ,भाई चारे की शान नहीं दिखायेगी याने जब जब सत्ता चाहेगी लड़गी -झगड़ेगी ,एक -दूसरे को आग में झौंकेगी ,बस्तियों को उजाड़ेगी ।यह सब करने के लिए जनता याने देश सावधान तुम्हें सत्ता के इशारों पर चलना है ।न्याय बिकेगा ? सरकार बिकेगी ? शासन के अफसर बिकेंगे? राजनेता बिकेंगे ।जनता मूक दर्शक बनी सब देखेगी ? सत्ता खेल खेलेगी और जनता देखेगी ? कविता बहुत कुछ कहती हैं ।चेतना के मनन और चिंतन की दिशा के द्वार पर दस्तक देती है ।बस जरुरत तो सूंघने और महसूस करने की है ।हम से क्या छीना जा रहा है ।उसे जानने समझने की जरुरत है ।कल कविता शेष अंश – – २
विनीता रघुवंशी
