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परेड ग्राउण्ड पर –२
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देश ! लेन बनाने के लिए
एक दो तीन बोलेगा
देश ! तीन तीन की लेन में
तेरह तेरह खड़ा होगा
देश ! तीन तेरह हो !
एक दो एक !
सम्यक !!
हड्डियां कड़कड़ीबट्ट रखेगा
पेट को पीठ से मिला लेगा
सिर्फ लम्बा लम्बा खड़ा रहेगा
निरीक्षण के लिए
महामहिम! करोड़ों करोड़ों
तिनकों -सी आबादी वाला
कर्जों फर्जों से लदा
सारे जहां से अच्छा ये गुलिस्तां
उसांसें छोड़ता
परेड ग्राउण्ड पर
पूरी मुस्तैदी से
आपके निरीक्षण को तैयार हैं जी !!
हां ,तो देश तैयार रहेगा
देश ! तैयार हो !
जब तक महामहिम निरीक्षण करेंगे
कोई मिमियायेगा नई
अपने को बीमार नई समझेगा
मरघल्ली नई लगेगा
मुंह पर बैठी मक्खियां नई उड़ायेगा
आंतें बेल्ट से कसे रखेगा !
लो ! महामहिम पर पर
बुलेट प्रूफ खुली जीप पर
सवार हो गये हैं
रौंदी जाने लगी है जीप के नीचे
करोड़ों खुरदरे हाथों से बुनी कालीनें
और अब महामहिम ले रहे हैं
निरीक्षण के बाद का सेल्यूट
सिर्फ बज रहे हैं
देश की उतारी हुई खाल वाले बूट
और लो महामहिम सही सलामत
लौट आये हैं सलामी लेकर
देश ,कंकाल जैसा सावधान है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच“” से उद्धृत ,कविता —” परेड ग्राउण्ड पर ” का अंश —-२ )
आज के अंश में शब्दों के प्रयोग और उनकी अर्थ गर्भिता व्यंजना का रस कुछ ऐसे तंज हमारे सामने उभारता है कि आह भी निकलती है और वाह वाह किये बिना रुकती नहीं है ।यह कविता कालजयी कविता कहीं जा सकती है । जहां सत्ता का पूरा स्वरुप जनता की खाल उतारने पर ही उतारु वाला ही रहता है । देश का यथार्थ शब्दों के भीतर ढल कर आ गया है ।तीन तेरह होना ये एक मुहावरा है जिसका मतलब है बिखरना ,विभाजन ,खण्ड खण्ड हो जाना ।आज देश इसी तरह सत्ता की कारगुजारी के कारण हिन्दू मुसलमान की नफरत भरी राजनीति का खामियाजा भुगत रहा है ।सत्ता ने घर ढहाते ,घरों में आग लगाई, दंगें भड़काये और देश को ये सब मालूम नहीं होने दिया ।जनता को सावधान किया जाता रहा ।लेन बनती रही और फूट गलती रही । हड्डियां कड़कडीबट्ट रखेगा याने सूखी रखेगा ।कुछ पोषण नहीं करेगा मायने हैं भूखा मरेगा पर सत्ता का कहना मानेगा ।पेट को पीठ से मिला लेगा ।यह है आम जन की स्थिति ।भूखा रहेगा लेकिन सत्ता के इशारे पर काम करेगा ।देश सावधान ।यह सत्ता का हुकुम है ।सरकार के निर्देश है ।सिर्फ लम्बा लम्बा खड़ा रहेगा ।निरीक्षण के लिए । जनता को परेड ग्राउण्ड में निरीक्षण के लिए तैनात सूबेदार महामहिम को निरीक्षण के लिए आमन्त्रित कर रहा है यहां भी शब्दों के भीतर समाया यथार्थ अपनी अर्थ व्यंजना के साथ तंज की बौछारें फेंक रहा है — महामहिम ! करोड़ों करोड़ों तिनकों सी आबादी वाला ।सारे जहां से अच्छा गुल सितां कर्जो -फर्जों से लदा ,उसांसें छोड़ता परेड ग्राउण्ड पर पूरी मुस्तैदी से आपके निरीक्षण को तैयार हैं जी ! यह कैसी दशा है हमारे देश की जो कभी सोने की चिड़िया माना जाता था आज देश के हर व्यक्ति पर कम से कम पांच हजार से लेकर दस हजार तक कर्ज में डूबा है ।फ़र्ज़ बहुत है ।वह भूखा रहकर भी अपने कर्तव्य का पालन कर रहा है ।किसी को मिमियाना नहीं है ,किसी को अपने आपको बीमार नहीं समझना है ,किसी को अपने मुंह पर बैठी मक्खियां नहीं भगाना है यह हरकत भी सरकार और सत्ता की खिलाफत मानी जायेगी ।बुलेट प्रूफ जीप श्रमिकों की मेहनत को रौंद रहे हैं महामहिम राजनेता ,प्रधान सेवक ।सिर्फ बज रहे हैं / देश की उतारी हुई खाल वाले बूट ।यह सरकार की क्रूरता का सच है जो धीरे धीरे चारों ओर से उघड़ रहा है ।यह सेना के निर्देश हैं लेकिन इनका उपयोग करके जनता की वास्तविकता को खोलने का और उस पर व्यंग्य के कोड़े बरसाने का काम कविता की नाटकीय स्थिति करती है ।आंतें बेल्ट से कसी जा चुकी है जिससे जनता को भूख का ख्याल भी न आये ? क्या जनता इस तरह के तिरस्कार को सह पायेगी ? जन सेवक रोड पर निकल पड़े हैं जनता कंकाल की तरह सावधान की मुद्रा में खड़ी है ।क्या ये बहुत अच्छी स्थिति है ? वास्तव में देश इस समय बेरोजगारी , मंहगाई ,और आर्थिक तंगी से झूझ रही है ।यह अवस्था ही वास्तव में जनता की प्राण हीन दशा है ।जनता की जान तो उसकी आर्थिक सुदृढ़ स्थिति में होती है ।जब उस पर बेरोजगारी और मंहगाई जैसी दुधारु तलवार लटका दी गयी तो उसके प्राण कैसे रहेंगे ? यह यथार्थ तो सभी को महसूस करना ही होगा ।तंज कविता के प्राण है और यह हर समय हर काल में सत्ता के सच को बताने के लिए चेतना जगाने के लिए विवेक शून्य स्थिति से मुक्त करने के लिए पाठक ,अध्येता को झकझोरती रहेगी ।
विनीता रघुवंशी
