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वंश संक्रमण
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मेरे परदादा ने
जो वृक्ष रोपा था
उसे मेरे दादा ने पाला पोसा
पिताजी ने खायें उसके फल
आज मेरे सामने वह
सूखकर हो गया जर्जर
जिसे मेरे पुत्तर ने काटकर
सुला दिया पथरीली जमीन पर
और चिरंजीव पोते ने
लगा दी आग
उसकी जड़ों के ऊपर !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में पीढ़ियों के बीच जिस वैचारिक बदलाव का अन्तर दिखाई देता है वह है संरक्षण की वृत्ति के बजाय खुदगर्जी और उपयोगिता के आधार पर वस्तुओं का उपयोग साज – संभाल और संरक्षण करने की प्रवृत्ति का बढ़ना महसूस किया जा सकता है ।एक वृत्ति होती है सभी मनुष्यों के हित में काम करते जाने की याने कर्म करो परिणाम की ,फल की इच्छा मत करो ।इसी वृत्ति से प्रेरित होकर बुजुर्ग पीढ़ी हर हमेशा ऐसे बहुत से परोपकार और मनुष्यता के काम करते रहे हैं ।जैसे पेड़ लगाना ,चिड़ियों का दाना डालना और परिंदों के लिए पानी रखना ,चींटियों को चुन डालना हो या गाय और कुत्तों को रोटी डालना ।यह सब सामाजिक और लोकहित के काम है । यह लोक में परोपकार और पुण्य माना जाता है ।बुजुर्ग पीढ़ी अपने आंगन में वृक्ष जरुर लगाती थी उनका।उनका मानना था कि पेड़ के बिना आंगन सूना रहता है ।यह सूनापन उन्हें भाता नहीं था ,आंगन है और उसमें वृक्ष की छांव है तो चिड़ियों की चहक होगी, बच्चे धूम मचायेंगे और सांझ -सवेरे आंगन की ठण्डी बयार या गुनगुनी धूप का मजा भी तो पेड़ के उस ओटले पर ही तो मिलेगा ।यह बुजुर्ग पीढ़ी की सोच थी लेकिन जमाना बदलता गया और जमीन के इंच इंच के भी दाम गिने जाने लगे ।आंगन का खुलापन और नीले आसमान की धूप छांव की परछाई ही जीवन से बिदा हो गयी ।सच है धीरे धीरे समाज पश्चिमी शिक्षा के इतने गहरे प्रभाव में आया कि जो रहन – सहन,दिनचर्या आदमी की सेहत ,भावनाओं , और मनोदशा को सहज तनाव मुक्त रखती थी वे धारणाएं ही बदल गयी।आदमी फ्लेट संस्कृति की चार दीवारी और बन्द डिब्बों से घरों में रहकर अपने आपको कैद करता गया ।उसके जीवन का खुलापन और परहित चेतना दोनों संक्रमित हो गई ।उसमें लोभ और लालच के विकार पैदा हो गये ।वह इतना ज्यादा खुदगर्ज हुआ की वह पर्यावरण जैसे लोक हितकारी चेतना की ही अनदेखी करने लगा ।घर हो या मकान आफिस कुछ भी जगह हो वह उसकी सेंटीमीटर के हिस्से को भी अपने उपयोग में ले लेना चाहता है ।यह आज के मनुष्य का मनोविकार भरा रुप है ।वह जल जमीन हवा मिट्टी आकाश जैसी प्राकृतिक उपादानों का भी भरपूर दोहन कर रहा है ।यह पीढ़ियों का वैचारिक बदलाव है लेकिन इस बदलाव से समाज को नुकसान पहुंच रहा है ।यह आज की पीढ़ी के मोह हीन होने का अहसास भी है जो परदादा की छोड़ी विरासत को नष्ट करने का ही काम कर रही है ।वह उस विचार या धारणा से बिल्कुल वास्ता नहीं रखती जिस से जुड़कर समाज के लोक के हित को सर्वोपरि मानते हुए हर मनुष्य ,हर आदमी पर्यावरण या यों कहें धरती के हरे-भरे पन में अपनी खुशी ढूंढता था ।जिसे पेड़ लगाकर परिंदों की चिन्ता होती थी पुराने समय में फल बेचे नहीं जाते थे फलों की टोकनिया घर परिवार में आपस में उपहार और आस्वाद के लिए लेन – देन होता था ।आज की पीढ़ी इस प्रकार के आदान – प्रदान की आत्मीयता से भी अनजान हैं ।वह सिर्फ पैसे की खनक से अपने रिश्ते जोड़े हुए हैं ।यह खनक उसे केवल भावना शून्य आदमी में ढालती है ।यह रिक्तता ही पीढ़ियों के वैचारिक अन्तराल को प्रकट करता है ।आज की पीढ़ी भावनाओं को महसूस करना भी भूल गयी हैं ।ऐसी अनभिज्ञ पीढ़ी केवल मोह जन्य वस्तुओं ,जड़ों को आग लगाने में माहिर हैं ।उसके पास जड़ों के प्रति कोई आसक्ति या गौरव नहीं ।वह अपने बुजुर्गों के परहित ,परोपकार ,के इतिहास को जाने – समझे बिना ,उनकी गंभीरता का मायना जाने बिना सब कुछ पुराना हो गया इस लिए नष्ट किया जाना चाहिए । लेकिन यह मन: स्थिति समाज के बिखराव को आमन्त्रित करती है ।जो लोकहित कारी है वह बिल्कुल सहेजने के काबिल होता है वह चाहे पेड़ों की जड़ हो या आदमी की वंशानुगत जड़ हों ।सब का संरक्षण मानव हित कारी ही है ।
विनीता रघुवंशी
