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ऊर्जा का संघर्ष —४
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विषपायी के कण्ठ में तुम
उन्मुक्त भाव से
पहले ही बैठी थीं
कितनी नीलवर्णी हो गई थी
शिव की देह
तभी से
आकाश भी
इसी विश्व कल्याणी रंग में रंगा
घट – घट व्यापी
रक्षा कवच बन गया है
शुरु से आज तक
परम सात्विका के रुप में
तुम्हीं तो
प्रकट होती रही हो
इसीलिए मुझे
पेड़ों का लहलहाना
नदी का बहना
हवा का छूना
धूप की ऊष्मा
पानी की तृप्ति
अन्न का जीवन होना
चिड़ियों का चहकना
फूलों का महकना
और धरती आकाश का
बार बार मिलकर
क्षितिज बन जाना
तुम्हारा ही रुप लगता है मेरी प्रार्थना !
अब तुम
मुझमें
इनमें
उनमें
सब में
संस्कृति के कण- कण ,तृण -तृण में
स्वर वर्षिणी होकर
धरती और आकाश
एक कर दो !
एक कर दो मेरी प्रार्थना !
एक कर दो !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की ऊर्जा के संघर्ष की चौथी कविता बिल्कुल समाहित हो चुकी है प्रेम में यहां मुझे मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावती महाकाव्य की नायिका पद्मावती के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए जायसी कहते हैं कि संसार में सृष्टि में जो भी कुछ ज्योति स्वरुप है वह सब पद्मावती के सौन्दर्य के कारण ही है । लेकिन यहां रचनाकार अपने प्रेम की प्रतीति में इतना तल्लीन हो चुका है कि लौकिक प्रेम ,भौतिक प्रेम अपनी अस्मिता और चेतना में प्रार्थना के उच्च स्तर पर स्थापित हो गया ।शिव का कल्याण भाव ही वह चेतना है जहां वे समग्र संसार को बचाने के लिए विषपायी हो गये क्योंकि उनके भीतर प्रार्थना का वही स्वर गुंजित बना रहा ।इस प्रेम मय प्रार्थना का प्रभाव कितना कितना गहरा है कि आकाश भी इसी प्रार्थना भाव से संसार का रक्षा कवच बना हुआ है ।यही कारण तो है जो हम पर ओजोन परत छाई हुई है और धरती का कण-कण ,तृण -तृण संरक्षित है जीवन दायक है ।सृष्टि के सृजन क्षण से लेकर आज तक मनुष्य मात्र में यही सात्विक प्रार्थना भाव रहस्य और दर्शन ,अध्यात्म ,धर्म चेतना के रुप में समाया हुआ है । यह प्रार्थना का भाव कहां कहां प्रकट नहीं है ? यह पेड़ों के लहलहाने में ,नदी के बहने में ,हवा की शीतलता में ,धूप की ऊष्मा में ,पानी की तृप्ति में ,अन्न के प्राणमय होने में , चिड़ियों की चहक में ,फूलों की महक में ,और धरती आकाश का मिलकर क्षितिज हो जाने में यदि कुछ प्रतिभासित है तो वह है प्रार्थना का स्वर प्रार्थना का लोक कल्याण कारी रुप । इसीलिए रचना में भी अन्तर भाव प्रकट हुआ है कि यह प्रार्थना का स्वर हर मनुष्य में समाहित हो जाये ।प्रेम मय यह प्रार्थना ही सच्ची भक्ति ,सच्ची श्रध्दा,सच्ची आस्था है । प्रेम मय यह प्रार्थना का स्वर धरती आकाश के कण -कण में तृण -तृण में अवतरित हो और सारी सृष्टि एक ही राग भाव से गमकती रहे ।समग्र संसार शिवत्व का प्रतिभास हो जाये ।तब ही मनुष्य की ऊर्जा का संघर्ष सार्थक होगा ।यह प्रेम की निजी अनुभूति जब परानुभूति के रचाव में जुटती है तो वह शिव के कल्याण मय रुप को धारण कर लेती है ।यही तो प्रेम का वास्तविक अनुभव है जो निजता से मुक्त होकर सर्व हित कारी होकर लोक मंगल मय प्रार्थना के स्वर में बदल जाता है ।यह भौतिक से मुक्त सार्वभौमिक रुप में जगत को अपनी प्रतीति कराता है । यह है प्रेम की लोक मंगल कारी अवस्था जो सब भेद मिटा देती है धरती और आकाश को एक कर देती है ।यह ऊर्जा का संघर्ष मामूली नहीं है इसमें चेतना का रुपान्तरण होता है ,संवेदना को सक्रिय किया जाता है,जब करुणा विगलित होती है ,और विवेक विकार शून्य होता है तब ऊर्जा प्रार्थना में परिवर्तित होती है । यह मनुष्य की भाव दशा की सबसे उच्चतम स्थिति होती है ।सब के मन चेतना आत्मा में प्रार्थना का मंगल कारी रुप स्थित हो इसी मंगल भावना सहित ।
विनीता रघुवंशी
