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ऊर्जा का संघर्ष —-३
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वाक्यों
शब्दों
अर्थों के
आपसी तनावों से मुक्त
मैं
स्वरों के
संसार में समा गया हूं
और ये भी मुझमें बैठकर
ब्रह्म रन्ध्री हो गये हैं आज !
ओ प्रार्थना !
ओ पीयूष वर्षिणी !!
तुमने आते ही यह किया
कि अब
मैं भी बजने लगा हूं
और सजने लगा हूं
पूजा के थाल -सा
जिसके प्रदीपों को
मानस गंगा में छोड़ता हुआ
उत्सव मना रहा हूं मैं
तुम —
इनका ही आलोक संगीत बनकर
मेरे कण्ठ में
अवतरित होती रहो
अवतरित होती रहो
अवतरित
होती
रहो
और
बोती रहो —-वह
जो —है !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत
कविता की शुरुआत में ही—” वाक्यों ,शब्दों ,और अर्थों के आपसी तनावों से मुक्त ” सच है जब प्रेम में वाक्य शब्द और अर्थ का आपसी तनाव खत्म हो जाता है तब ही प्रेम की सच्ची अनुभूति और प्रार्थना के भाव का उदय होता है ।मन ही समझे मन की बात की स्थिति में डूबकर ही प्रेम की प्रगाढ़ता का अनुभव किया जा सकता है ।अन्यथा हजार बार कसम खाने के बाद भी लोक में प्रेम की प्रतीति और भरोसा उपहारों के बीच ही उलझा रहता है और हर बार स्पष्ट करने के बाद भी संशय ,शंका तनाव की दशा बनाती रहती है । इसीलिए यह प्रेम की अवस्था भाषातीत है । यह ऐसी अनुभूति है जहां केवल महसूस किया जा सकता है व्यक्त नहीं किया जा सकता ।गूंगे के आस्वाद की तरह । यह प्रेम का अनुभव अन्तर स्वर की तरह निरंतर आत्मा ,मन,चेतना में बज रहा है ।यह प्रेम की सात्विक अनुभूति इतनी गहरी और सम्मोहक हो गयी है कि यह सांसारिक भाषा से मुक्त हो गयी जहां बस स्वर हैं ।यह भाषातीत हो जाने की अवस्था इतनी प्राणमय है कि खुद ही खुद में बैठकर अपने आपको सुनना ।यह अवस्था दर्शन में रहस्य में ब्रह्म में घुल-मिल जाने की अवस्था समान है ।मैं भी ब्रह्म रंन्ध्री हो गया याने जिस तरह परम सत्ता की कोई भाषा नहीं है केवल उसे अनुभूत किया जा सकता है ब्रह्म तो रोम रोम में प्रकट है बस जरुरत है तो उसके स्वर नाद को सुनने की इसी तरह प्रेम मय प्रार्थना का स्वर भी ध्यान लगाकर ही सुना जा सकता है । ओ प्रार्थना /ओ पीयूष वर्षिणी यह संबोधन कितना मर्म स्पर्शी है ।यह तो योगियों के रहस्यवाद के दर्शन की सीमा को छू आया सा लगता है ।योगियों द्वारा कुण्डलिनी जागृत करके जिस अमृत पान की घोर तपस्या की जाती है लेकिन यह तो प्रेम रुपी प्रार्थना को पाकर ही पीयूष वर्षिणी का रसपान किया जा सकता है ।प्रार्थना में तल्लीन होकर ही कुण्डलिनी जागृत की जा सकती है । यह पीयूष वर्षा करती प्रार्थना का अवतरण ही मनुष्य में घनघोर परिवर्तन कर देता है ।अब प्रार्थना के आते ही आपाद मस्तक प्रेम के स्वर सांस सांस में बजने लगे हैं ।और यह गमक यहीं नहीं रुकती बल्कि आत्मा ,मन, चेतना ,संवेदना सब पूजा मय हो गये ।खुद अपने आपको पूजा की थाली सा अक्षत,रोली ,चंदन,फूल दीप आदि की महक से सजा हुआ सर्व अर्पित भाव में बदल गया ।जिसके प्रदीप जो पूजा के थाल में सजायें गये हैं मतलब अपने अन्दर की एक एक गुण मय प्रकाश अंश मानस गंगा में छोड़ रहा हूं ।यह कल्पना प्रेम की पराकाष्ठा ही तो है जहां समर्पण की चाह नहीं वरन अर्पण की भाव दशा है ।चाहे भी तो कितनी सात्विक है —“तुम इन्हीं का आलोक संगीत बनकर मेरे कण्ठ में अवतरित होती रहो ” अवतरित होकर करना क्या है? करना है प्रेम का बीजारोपण —बोती रहो —-वह / जो —है !! ” यही तो मनुष्यता और मनुष्य की मूल चेतना है ।यही तो आदमी की ऊर्जा है जिसके लिए वह हर समय हर दम भागता रहता है ।भटकता रहता है । लेकिन स्वर की नाद का कोमल तम स्वर सुनाई नहीं पड़ता और ना ही इस मन्दिर कोमल स्वर को वह प्रार्थना में ही बदल पाता है ।प्रेम एक तात्विक अहसास है जो जीवन की आपाधापी में सुनाई नहीं पड़ता ।प्रेम एक शोर भर बनकर रह गया है आज के समय में इसके प्रति विव्हलता नहीं और ना ही इसकी अनुभूति इतनी गहरी और सात्विक भी नहीं मानी जाती ।कौन कितना गहरा प्रेम करता है इसका प्रमाण भी तय नहीं किया जा सकता है ।जब सब कुछ बाजार और व्यापार की नजरों से ही आंका जा रहा हो तब वैसा प्रेम का प्रार्थना बन जाने की दशा बड़ी रमणीय और मनमोहक अहसास को जगाती हैं ।प्रेम एक गंभीर चिंतन और स्थिर भाव दशा है जो मानव मन में हर समय विद्यमान होती है ।यही आदमी की सबसे बड़ी पहचान भी है लेकिन हर वक्त मनुष्य इस दशा पर ही शंका और अविश्वास जताता है ।यह मानवीय चेतना का हिस्सा है । इसीलिए जब तक मनुष्य है प्राणी है तब तक प्रेम ही प्रार्थना बन कर सर्व मांगल्ये मांगल्य बनकर प्रगट होता रहेगा ।
विनीता रघुवंशी
