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ऊर्जा का संघर्ष –२
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ओ मेरी प्रार्थना !
तुम मुझे
एक स्वर के रुप में मिली
और मैंने तुम्हें आचमन की तरह
अपने कण्ठ की बंशी में विह्वलता के साथ
संजो लिया !
मैं अपनी
दिनचर्या में लगकर
तुम्हारे ही आलापों से गमकता हूं
अब मुझे
चींटी से लेकर हाथी तक को
हथेलियों और नजरों से
सहलाते हुए
तुम्हारा स्वर
उनके कण्डों में भी उतारना है
उलीचना है इस कोश को अन्ततः!
कि सम्पूर्ण सृष्टि ही
प्रार्थना पुरुष हो जाये और
विसंगतियों की
तमाम दरारें
तुम्हारी प्रभा में डूबकर
शुद्ध सच्चिदानंद बन जाये ।
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत)
आज की कविता में प्रेम का प्रार्थना मय रूपान्तरण हुआ है ।यह वह मनोदशा है जिसमें प्रेम के भाव का उदय होते ही मनोविकार और मनोविकृतियां मन से आत्मा से विलग हो जाती है ।यह आदर्श नहीं है जो प्रेम की दशा का विमर्श रच रहा है यह मन की वह साधु प्रकृति है जहां निर्विकार भाव दशा की अनुभूति होती है ।तब ही तो वह चींटी से लेकर हाथी तक जैसे जीव पर समदृष्टि प्रेम की सात्विकता की छाया पड़े बिना नहीं रहती ऐसी दशा में चींटी का काटना या हाथी का हमला दोनों सहन किये जा सकते हैं ।यह वह मनोवृत्ति है जो आत्मा और मन को शांत तृप्त भाव में डुबा देती है ।प्रेम ही वह ऊर्जा है जो मनुष्य को चेतनावान बनाता है ।प्रेम की अनुभूति और अनुभव के बाद ही मनुष्य के मन में प्रार्थना का उदय होता है ।अन्यथा आंख मींचकर घण्टों ध्यान मुद्रा का ढोंग करके भी आदमी सच्ची प्रार्थना का अनुभव और अहसास नहीं कर पाता। इसीलिए प्रार्थना के लिए सबसे पहले प्रेम की अनुभूति होना बहुत जरुरी है ।जब प्रेम की अनुभूति और अनुभव होगा तब ही प्रार्थना जन्मेगी ।यह प्रेम का गहरा और सच्चा अनुभव है जिसकी अनुभूति चेतना और संवेदना को परिष्कृत कर रही है ।प्रेम वहीं उच्च भाव दशा है जो मन और आत्मा को परिष्कृत करें ।यह परिष्कृत आत्मानुभूति की कविता है जहां प्रेम के अनुभव के आते ही मन की आत्मा की भाव दशाओं में बदलाव आ जाता है ।यहां प्रिया है जिसका असर इतना गहरा हो गया है कि वह प्रार्थना बनकर कण्ठ में मार्दव स्वर में ढल गई है यह कोमलता यों ही नहीं आई है यह प्रेम मय दृष्टि का सृजन प्रिया की सात्विक मौजूदगी की वजह से है ।यह प्रेम की अनुभूति ही प्रार्थना के स्वर में बदल जाने की अवस्था है ।यह स्वर कण्ठ में ही नहीं संजो लिया गया है बल्कि यह समाज की तमाम विसंगतियों ,भेदभाव ,असंगतता, असमानता सब को मिटाने के लिए ही इस प्रार्थना रुप में प्रेम का रूपांतरण हुआ है ।क्या ये प्रेम के भाव का समाजिकरण नहीं ? यह भाव जागृत होना कि समूची सृष्टि के मूल से हिंसा का विसर्जन हो जाये यह प्रेम मय प्रार्थना का विस्तार नहीं ? यहां प्रार्थना का “मैं ” से सर्व की दिशा में बढ़ने का उपक्रम नहीं ? ‘विसंगतियों की तमाम दरारें ‘ प्रार्थना की प्रभा में डूबकर शुध्द सच्चिदानंद बन जायें ।अर्थात चहुं ओर केवल शुभ भाव का वातावरण हो ,छल कपट,झूठ बेईमानी नफरत धोखा जैसी विकृतियां समाप्त हो और प्रेम मय प्रार्थना का स्वर ही सब ओर गुंजित हो यह कितनी मन मोहक अनुभूति का अहसास है ।सृष्टि का हर मानव मन इस विचार से ,इस चेतना से ,इस संवेदना से ,इस करुणा से परिपूर्ण हो तो सृष्टि के मानव में अहिंसा का संचार होगा ।क्या ये संभव है ? मनुष्य के विकारों पर विचार का संयम संभव है ? यदि यह संभव होगा तब ही सच्ची प्रार्थना का स्वर कण्डों को राग से भर देगा ।मानवता का राग सब ओर सुनाई देगा ।
विनीता रघुवंशी
