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ऊर्जा का संघर्ष –१
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ओ मेरी प्रार्थना !
यह मैं नहीं जानता
कि हममें से पहले
किसने किसे पाया
मैं एक यायावर
अपने ही —
अन्तर की
कस्तूरी गंध में खोया
जब एक एक वनस्पति को सूंघता हुआ
मैदानों वनों और
पहाड़ों में
कुलांचें भर रहा था
तब तुम —-
एक अक्षय गंध कोश की तरह
मेरी ही नाभि में समा गई थीं
उस वक्त तुम भी यायावरी थी
तब तुम्हें एक हिरण्यगर्भ की
खोज रही होगी
तुम्हें नाभि से लेकर
कण्ठ तक खींचने की यात्रा
मुझे अकेले ही करनी पड़ी
बहुत बहुत यातना में डूबीं हुई
एक सुखद अनुभूति है यह
कितने ही
शब्द पर्वतों के
हिंसक अहिंसक परिवेशों को
पार करता हुआ मैं
आज तुम्हें एक स्वर दे पा रहा हूं
यह मेरी ऊर्जा का
पहला संघर्ष है मेरी प्रार्थना !
अब तुम्हें
यायावरी नहीं रहने दूंगा
नहीं रहने दूंगा यायावरी तुम्हें
तुम्हें
मेरे ही मानसरोवर में बैठकर
सहस्रदल कमल बनना है
जिसकी पंखुरियों के
खुलने के अन्तर्नाद को पीता
मैं एक जीता हुआ प्रार्थना स्वर बन सकूं
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत)
आज की कविता में प्रेम के सार्वभौमिक अस्तित्व को स्थापित करते हुए यह भी स्वीकार किया गया कि बिना प्रेम की अनुभूति के मनुष्य जीवन केवल यायावर ही है । यदि प्रेम की अनुभूति है तो आदमी का जीवन अर्थवान है ।यह प्रेम का भाव मन में पैदा होते ही मनुष्य के जीवन को एक अर्थ मिल जाता है ।जिस तरह मनुष्य प्रेम के लिए भटकता है उसी तरह प्रेम भी जगत में यायावर बना अपनी चेतना को पाने के लिए यायावर बने घूमता है ।आदमी और प्रेम एक दूसरे की खोज में चक्कर काटते हैं । मनुष्य यह नहीं जानता कि जिस प्रेम को खोजने के लिए वह यहां वहां भटक रहा है ।मैदानों वनों वनस्पतियों को टटोल रहा है वह कस्तूरी गंध तो उसके ही नाभि कोश में बन्द हैं । यहां वहां खोजने से भी कुछ हासिल नहीं होगा ।कबीर ने भी कहा है —कस्तूरी कुण्डल बसे ,मृग खोजें बन माहि ।यह कस्तूरी क्या है ? यह अद्भुत तत्व ,यह अद्भुत पदार्थ ,यह पारस मणि क्या है ? यह मनुष्य के हृदय की कंचन स्थिति है । यह वह दशा है जिसे पा जाने के बाद आदमी अपने आपको भूल जाता है ? क्या है ये बेखुदी ? यह प्रेम का पा जाना ।यह आत्मा की गहरी अनुभूति का पा जाना ।सच है । इसीलिए तो कविता की शुरुआत में ही यह सवाल उठता है कि हममें से किसने किसे पाया ।पहले मनुष्य आया या पहले प्रेम आया ? प्रेम ही तो प्रार्थना है ।जो निस्सीम है । जो अटल है ।जो परिपूर्ण है ।जो देह से मुक्त भाव है ।यह भाव की प्रतीति ही तो प्रेम है ।जब मनुष्य प्रेम पा लेता है तो फिर कुछ भी नहीं पाना शेष रहता ? अपनी खोज और तलाश को हिरण की कुलांचें कहना भी कितना कितना मनोहारी है ।प्रेम याने प्रार्थना का मनुष्य में एकाकार हो जाने की अवस्था भी कितनी भावाकुल है —” मेरी ही नाभि में समा गई थी ” यह समाना मामूली नहीं है आत्मानुभूति है ।जो सिर्फ प्रेम को प्रार्थना की उच्च अवस्था तक महसूस करने का दर्शन । यहां प्रेम की वह भौतिक अनुभूति जो देह से देह के आकर्षण तक ही महसूस की जाती है वह उस क्षितिज को पार कर लेती है ।इस भौतिक अनुभव से प्रेम का भाव मुक्त होकर आध्यात्म का और दर्शन का हिस्सा बन जाता है ।यह आदमी की वह यात्रा है जिसमें आदमी को बहुत बहुत सारी सामाजिक,परिवेश गत ,हिंसक तानों – तंजों का सामना करना पड़ता है ।बहुत से अहिंसक शब्दों की बागुड़ खड़ी करनी पड़ती है ।बहुत सारी असहमतियों के पहाड़ , पर्वतों को लांघना पड़ता है ।यह प्रेम को प्रार्थना तक बनाने का सफर बहुत संघर्ष मय होता है । यहां प्रार्थना भाव की अनुभूति ही प्रेय को श्रेय में बदल देती है । यहां प्रेम प्रार्थना की उच्च भाव दशा में बदल जाता है ।यह भाव ही तो है प्रेम के सार्वभौमिक और सर्व कल्याणी रुप में ।यही तो है वह अनुभूति और अनुभव जो नाभि से लेकर कण्ठ तक खींचने का प्राणायाम । मनुष्य के जीवन में प्रेम का पहला अनुभव ,पहली अनुभूति ही वह ऊर्जा है जिसके लिए वह निरंतर संघर्ष रत रहता है ।वह आत्म चेतना का उत्सर्ग करना चाहता है । इसीलिए जब प्रेम की खोज पूरी होती है तो एक संकल्प उभरता है — “अब तुम्हें / यायावरी नहीं रहने दूंगा / नहीं रहने दूंगा यायावरी तुम्हें ” यह दृढ़ता संकल्प की याने मनुष्य और प्रार्थना बना प्रेम अब एक मेक हो गये हैं ।देह से निकल कर प्रेम मानस में स्थापित हो चुका है ।यह प्राणायाम की वह उच्चा अवस्था है जहां कुण्डलिनी जागृत हो चुकी है और प्रेम ,आराध्य का स्वरुप प्रार्थना बनकर मानस में स्थापित हो चुका है तब पंखुरियों के खुलने का अन्तर्नाद को सुनने की भाव दशा में खुद एक प्रार्थना स्वर बनने की ललक कितनी कितनी चेतन है यह भाव दशा में डूबकर ही अनुभूत किया जा सकता है ।कोरी निगाहों से प्रेम केवल देह का आकर्षण होता है लेकिन भाव दशा की उच्च अवस्था उसे मनुष्य जीवन की सार्थक प्रार्थना में बदल देती है ।क्या सचमुच मनुष्य प्रेम के बिना अधूरा है ? जब प्रेम रुपी कस्तूरी उसके ही गंध कोश नाभि में स्थित है तो तलाश बाहर क्यों ? यह बाहर की तलाश है अपनी प्रिया की जिसकी नाभि में भी प्रेम रुपी कस्तूरी बसी है ।यह खोज मनुष्य की खोज है ।प्रेम का स्वर जीवन का स्वर है यही अन्तर्नाद है । मनुष्य जीवन में प्रेम की सर्वोच्च अवस्था ही प्रार्थना है । यह भाव लौकिक से अलौकिक दिशा में बढ़ता अनुभव से आत्मानुभूति तक की दशा में बदल गया ।वास्तव में मनुष्य की सबसे पहली और अन्तिम खोज प्रेम मय प्रार्थना की ही होती है ।यह तो अनुभूति का सर्वोत्तम स्वरुप है जो प्रार्थना में महसूस किया जा सकता है ।
विनीता रघुवंशी
