Home आज की कविताप्रति प्रश्न-पहाड़ों के बीच

प्रति प्रश्न-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
प्रति प्रश्न
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ये तमाम घोंसले
अब सुगबुगाते तक नहीं
इन बस्तियों की उदासी
बहुत बहुत गहरा गई है
घर घर की खिड़की दरवाजे बन्द हैं
कुण्डली मारे बैठा है अन्धकार
इस बस्ती के सूने पृष्ठ पर
एक उभरते शीर्षक जैसा हूं मैं
उदास खामोशियों की
प्रेतात्माओं से परेशान दस्तकें देता द्वार द्वार
कोई भी दरवाजा नहीं खोलता —
फिर भी
आखिर थका हुआ
सुनसान राह पर खुद को धीरज देता
यहां इस चट्टान तक आ गया हूं
कैसे लोटूं ?
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत)
आज की कविता में बस्ती अर्थात समूचा देश जिस अन्धकार से घिर चुका है उस से वापस उजाले की ओर लौटने की इच्छा के भीतर से सवाल खड़ा हो रहा है ।इस गहन अन्धकार जहां स्वार्थ का ,लालच का ,लोभ का, नीति का घनघोर अंधेरा छाया हुआ है ।ऐसे गहन अन्धकार में अपनी लौटने की राह तलाशना बेहद मुश्किल हो चुका है उस समय में बस्ती के घरों की सुगबुगाहट खत्म हो चुकी है सब पर स्थितियों ने अपना असर डाल दिया है ।ऐसी वे कौन सी दशा है जिसके कारण बस्तियां अपनी हलचल ,अपनी सुगबुगाहट,अपना चहचहाना छोड़ चुकी है ।ये हालात कहीं राज व्यवस्था से जुड़े तो नहीं या फिर समाज की रीति – नीति ,परम्परा या अनुशासन कहीं संकट ग्रस्त तो नहीं ? कहीं सामाजिक असमानता तो नहीं ? कहीं राजनीतिक सत्ता का कठोर नियंत्रण तो नहीं ? क्या है ये घनघोर अन्धकार की वजहें ? कहीं आर्थिक दिक्कतें तो नहीं ? वे कौन सी अवस्था है समाज की देश की घरों की कि वे कपाट बन्द किये हैं ? क्यों कुण्डली मारे कर अन्धकार घरों के बाहर बैठा है ? इसकी वजह तो मालूम होनी ही चाहिए ।संकट यदि इतना गहरा है तो उसका सामना भी तो सभी को एकजुट होकर करना ही होगा ।पर दस्तक देने से भी जो द्वार भय से बन्द हैं ।यह भय किसका सत्ता का ,सरकार का ,शासन का, अन्याय का ,सख्ती का ,कैद का ,कारावास का किस बात का भय है ।इस चुप्पी का कारण क्या है ? इस सूने पृष्ठ पर एक उभरते शीर्षक जैसा अपने आप को महसूस करना कितनी गहरी पीड़ा है ।जहां भय से निकलने की कोई राह न हो और उस पर अकेले होने का अहसास ? पीड़ा की अनुभूति है ,महसूस भी हो रही है लेकिन कोई साथ नहीं है ।यह वह स्थिति है जहां कबीर कहते हैं —कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ। मांगे सबकी खैर जो घर फूंकें आपना ,चले हमारे साथ ।। लेकिन सब भयग्रस्त हैं साथ कोई नहीं ? इसीलिए प्रति प्रश्न खड़ा हुआ कि अब मैं तो निकल आया अब लौटूं कैसे ? जो भय से मुक्ति की राह पर चल पड़ा वह लौटे कैसे ? कितनी कितनी दुविधा है कि भय मुक्त सब होना चाहते हैं लेकिन भय का सामना करने के लिए कोई साथ नहीं आना चाहता ? कैसी विपरीत मनोदशा है ।यही तो समाज की चेतना का अंकन है ।समाज की संवेदना और विवेक इतना ज्यादा भयभीत हो चुका है कि वह कानाफूसी करना भी भूल गया ।यह मनोदशा शुभ का संकेत है या संकट का ? यह समाज को अपनी चेतना को तलाश करना पड़ेगा ।इस चेतना शून्य बस्ती के भीतर चेतना के उजाले को लेकर कैसे लौटूं प्रश्न ये भी बड़ा है ।उजाला तो सब चाहते हैं लेकिन चेतना ,अनुभूति,संवेदना ,ज्ञान ,दृष्टि सबकी अन्धकार ग्रस्त हैं ऐसे हालात में ज्ञान के प्रकाश ,विवेक को उजास में कैसे बदला जाये ,संवेदना का उजाला कहां से आयेगा ? अनुभव बहुत प्रखर है लेकिन न्याय का सत्य कैसे ज्योति में फैले यह सब करना तो है लेकिन कैसे ? उस चेतना हीन मनोदशा में कैसे संभव है ? प्रश्न जमीन की हकीकत पर स्थिर है ? चेतना सक्रिय हैं ।एक एक मनुष्य का जागना बेहद जरुरी है तब ही ज्ञान के प्रकाश की ओर लौटना संभव हो सकेगा .क्या यह जागना संभव है ? 🙏विनीता रघुवंशी

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