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राजमहल की खरीद के साथ-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
राजमहल की खरीद के साथ
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लंबी कविता का अन्तिम अंश —–४
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गढ़ के पत्थरों
सुना है — अब तुमसे बारुद बनाई जायेगी
यह झूठ भी हो
तो — इतना तो सच है कि तुममें
वे तमाम खूबियां हैं
जिनसे बनती है बारुद
जालपा की
ज्वालामयी आंखों की तरह देखो
कि तुम्हारे अन्दर वह
कहां कहां है —
जिस दिन
तुम्हारे चलन बारूदी होंगे
उसी दिन तुम्हारे हक में
अपने आप गा उड़ेंगे हरबोले
“कि ऐसे आदमियों का
होना भी भला क्या चीज़ है “
और नेवज
कितनी घुलनशील होगी
तुम्हारे बीच
खुद को इतना पानीदार पाकर
एक एक लहर के साथ
कितनी कितनी चमकदार होगी
हजार हजार सपनों वाली आंख की तरह ??
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच” से उद्धृत,लंबी कविता –“राजमहल की खरीद के साथ ” का अन्तिम अंश —-४ )
लंबी कविता के समग्र पर बात करते हुए उसके अन्तिम अंश को भी विमर्श के बीच रखना पड़ेगा ।राज निवास के स्थल यद्यपि जन मन में गौरव और गरिमा की प्रतीति कराते हैं । लेकिन राजतंत्र जितना ही मोहक और जन मन की अनुभूति को भले उसके ठाठ-बाट सज-धज रुचिकर लगे फिर भी वे जिस मानवीय चेतना से विलग एक ऐसी सत्ता भोग की स्थितियां बनाती है जिसमें सामान्य आदमी के अस्तित्व का ,उसकी निजी जीवन का कोई मान -सम्मान नहीं होता न वह राजवंश के लिए कोई खास अहमियत ही रखता है ।राजा और राजपरिवार के लिए सब कुछ इस्तेमाल और उपभोग का साजो -सामान होता है ।यह जनता की दुरावस्था ही है । राजतंत्र बेहतर होते हुए भी भारत ने प्राचीन काल से चली आती इस राज – व्यवस्था को स्वतंत्रता के साथ ही बदल डाला और लोकतंत्र की राज – व्यवस्था का चयन किया ।एक संविधान बनाया और राजवंशों में बंटे भारत के खण्ड खण्ड को एक अखण्ड राजनीतिक राष्ट्र का स्वरुप दिया ।यह बदलाव ही जनमानस की चेतना के बदलाव के कारण सम्भव हो सका । लेकिन समय के साथ साथ लोग बदलते हैं उनके आसपास की स्थितियां और हालात बदलते हैं और इन सबके कारण आदमी की चेतना में भी परिवर्तन होता है ।यही चेतना का बदलाव ही राजगढ़ की परिस्थितियों से घिरी जनता के भीतर भी दिखलाई पड़ता है ।हमारे समाज के अंग्रजों ने जिस आजादी के लिए निरंतर संघर्ष किया और लोकतंत्र की राजकीय व्यवस्था लागू की उसी व्यवस्था को हमने फिर से प्रजा बनकर राजसी रंग -ढंग में रुपहला बना दिया । इसीलिए तो कविता की यह पंक्ति गौर करने के काबिल है —-” गढ़ के पत्थरों ! ये गढ़ के पत्थरों याने निश्चेतन मनुष्य जिनके भीतर बदलाव की इच्छा ही नहीं है ।जो हालात को इस कदर अपने पर चुपड़ चुके हैं कि उनको अपनी देह अपने मन ,अपनी आत्मा ,अपनी चेतना अपनी बुध्दि अपनी आंख कान जुबान तक को निश्चेष्ट कर चुके हैं ।वह लम्हा वह अखबार में छपा बयान कि राजगढ़ की पहाड़ियों के पत्थरों से बारूद बनाई जायेगी ।किस कदर हलचल मचा देता है ।जनता जो कि प्रजा बनी हुई है हर हालात के भीतर दबी हुई दुरावस्था में जी रही है ।उसके लिए खबर वरदान तो नहीं कि उसे भी अपनी चेतना को टटोलने का मौका मिला है ।यह भी एक दृष्टिकोण उभर कर आया की जनता से प्रजा बन चुकी तमाम रियाया को अपने सोचने- विचारने की क्षमता का अहसास पहली मरतबा हो रहा हो ।खबर झूठ भी हो तो भी जन साधारण के भीतर चेतना जगाने के लिए वह पर्याप्त हौंसला अफजाई के लिए बेहतर है ।जन साधारण पहली मरतबा अपनी मन – बुध्दि चेतना ,विचार का इस्तेमाल अपने आपके हालात बदलने के लिए इस्तेमाल करेगा तो राजगढ़ की नेवज नदी का कतरा कतरा चमकदार और आबदार होगा । जब जब हरबोले इतिहास गान करेंगे तब तब राजगढ़ के जन सामान्य का इतिहास रचा होगा ।बारूदी चलन अर्थात विरोध का दम आम होगा ,स्थितियों को प्रलोभन को नकारने की दृढ़ता होगी उस दिन इतिहास जन साधारण का लिखा जायेगा ,गाया जायेगा ।जब राजगढ़ या देश के किसी भी हिस्से के जन साधारण अपनी यथास्थिति वाली खोल को चीर कर बाहर आयेंगे उस दिन उस हिस्से की आबादी की आंखों में सपनों की चमक खुद ब खुद रच बस जायेगी ।आंख याने दृष्टि भी खुद की और कर्मठता के सपने भी खुद के ।राजमहल तो हर काल में बनेगे बिकेंगे यह सब अनवरत है । लेकिन जन सामान्य की चेतना निरंतर नव सृजन के सपनों से चमकते रहने चाहिए तब ही जन सामान्य की अस्मिता का महत्व है ।सूनी आंखें विगत के वैभव से अंधी हो सकती है लेकिन चेतना की आंख में दृष्टि तेज होना चाहिए जो सृजन को देखने आतुर रहे ।
(लंबी कविता —“राजमहल की खरीद के साथ ” का अन्तिम अंश —४ ) 🙏 विनीता रघुवंशी

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