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राजमहल की खरीद के साथ
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लंबी कविता का अंश —–३
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अब भी
गा रहे हैं वे —
” गर फिरदोस
बररुए जमीनस्त
हमीनस्तो— हमीनस्तो ——-हमीनस्तो “
इनके लिए
कुछ भी तो नहीं बदला !
राजा बदले
तो साहेब आये
लेकिन —-
नजारे वहीं है
पुरानों की जगह
ने हर बोलों की भर्ती हो रही है
तरक्की के लिए
आलमारियां खरीदी जा रही हैं
बांधें जा रहे हैं पट्टे
वफादारों के गलों में
ताकि वे —
निश्चिन्त होकर
जिन्दगी के इकतारे पर
स्वामीभक्ति के भजन गाते गाते
सहज समाधि में डूबकर
नागरिकों को तन्मय कर सकें
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लम्बे लम्बे
गोह रस्सों पर लटके मजदूर
महल की पुताई में
लगा दिये गये हैं
मैं चाहता हूं कि ये मजदूर
ऊपर से गिरने के पहले
दूर – दूर क्षितिजों तक फैली
घृणा और लालच की
रंग बिरंगी शक्लें तो देख लें
मैं जानना चाहता हूं
इस राजमहल की नक्काशियों में
भूख से भी बड़ा
ऐसा कौन हातिमताई रहता है
कि जिसकी गिरफ्त में
वे पत्थर
अपनी रोटियों से बेखबर
इसके तामझाम को ही
देखने में मशगूल है
इन्हें अब तो
समझना चाहिए कि
दूसरों के वशीकरण में
मस्त होने वाले
अपनी ही ताकत के
गुनहगार होते हैं
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( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–“पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत लंबी कविता —-” राजमहल की खरीद के साथ ” का अंश —३ )
आज की कविता अंश में यथास्थिति में जीते मनुष्यों और आदमियों की उस दास्तां भरी मानसिकता का यथार्थ चित्रण है जो स्थितियां बदल जाने पर भी अपनी धारणाओं ,विचारों ,चेतना में रत्ती भर भी बदलाव नहीं करते । राजतंत्र से लोकतंत्र की स्थितियां बन गयी ।राजा और राजवंश बिदा हो गये किन्तु मन में अब भी राजा विराजमान हैं ।उसकी शान – शौकत ठाठ-बाट सब यथावत मन में विद्यमान है ।यह मनोदशा ही आदमी की चेतना को स्वतंत्र नहीं होने देती इसीलिए वे बदले हुए माहौल में भी पुरातन व्यवस्था के प्रति दृढ़ चित्त रहते हैं ।वे जमीन पर स्वर्ग की कल्पना में भी अपने मनोराज्य को ही स्थापित मानते रहते हैं यह है चेतना में दासत्व का घुल-मिल जाना । राजतंत्र बदला लेकिन शासन – प्रशासन की मशीनरी या यांत्रिकता ने नये सरकारी अधिकारियों को साहेब बनाकर उन्हें लालची और स्वार्थी भ्रष्ट अधिकारी में तब्दील कर दिया क्योंकि जनता की मनोदशा ने व्यवस्था के बदलाव के हालातों को उतनी गहराई और तर्कशील मन:स्थिति से स्वीकार नहीं किया और ना ही बदली हुई स्थितियों को जान – समझा ही । इसीलिए वह सरकारी कारकूनों से नियमों से कानूनों से हर हमेशा भयभीत और डरी हुई रही । जनता की इस मनोदशा का बेजा लाभ लोकतंत्र के सरकारी अफसरों ने खूब उठाया ।शोषण और भ्रष्टाचार के बहुत सारे रास्ते और तरीके खोजे गये और धीरे धीरे जनता सुषुप्ति की चिरनिंद्रा में डूब गई। जनतंत्र फिर से पूंजी के हाथों में फिसल कर वफादारियों और गद्दारियो की पड़ताल में मशगूल हो गया ,सत्ता भोग ,राजवंशीय चरित्र में ढल गया ।यह लोकतंत्र के पतन की महादशा है । जब राजमहल बिक गया तो नये मालिक बनी सरकार ने उसकी रंगाई -पुताई का काम शुरु किया बड़े बड़े रस्सों पर जान जोखिम में डालकर मजदूर लगायें गये ।यह केसी इच्छा है कि जो मजदूर महल की पुताई के लिए चढ़ायें गये हैं वे गिरनै से पहले उन क्षितिजों को देख लें जहां तक लालच और घृणा का विस्तार है ।सच है सत्ता बदलती है लेकिन सत्ता की साजिशें ,सत्ता की हरकत और समाज में विभाजन की रेखाएं खींचने का काम जारी रहता है ।”मैं जाना चाहता हूं ” कि जिज्ञासा का जागना ही तो चेतना है ।जब आम आदमी में जानने की इच्छा जागेगी तब ही तो व्यवस्थाएं एक व्यक्ति की महत्ता का व्यूह तोड़ेगी तब ही तो तमाम व्यवस्था का लाभ आम आदमी तक पहुंच पायेगा ।यह भी जानना जरुरी है कि राजमहल की मीनारों ,बुर्जो,गुम्बदों की नक्काशी में ऐसा क्या आकर्षण छुपा है जिसे देखकर आदमी अपनी भूख को भूल जाता है ।राजा या राजवंश की गौरव गरिमा और महत्ता में खोया हुआ अपनी अस्मिता ,अपने अस्तित्व ,अपने अहसास ,अपनी अनुभूति,अपने अनुभव ,अपने महसूस करने की क्षमता सब खो देता है ।याने सोचने – विचारने की शक्ति परवश हो जाती है ।जब जब भी आदमी ,नागरिक ,मोहगग्रस्त होकर अपनी चेतना को दूसरे के अनुसार उपयोग करते हैं याने दूसरे के कहने पर ,दूसरे की मर्जी पर इस्तेमाल करते हैं तो यह अपनी ताकत का अर्थात अपनी ऐन्द्रिक क्षमता अपनी मन बुध्दि चेतना का तिरस्कार करते हैं ।यह सबसे बड़ा गुनाह मतलब अपराध है ।दूसरे के वशीकरण से अपने को सक्रिय करना बहुत बड़ा अपने आप का अपमान है । (लंबी कविता का अन्तिम अंश कल दिनांक १६/४/२४ को )
विनीता रघुवंशी
