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राजमहल की खरीद के साथ
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लंबी कविता का —-अंश —-३
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बेनजीर बाग की
ऐशगाहों में बची शिनाख्तें
अब भी जब तब
कुछ बोल देती है
कि —
उसके दादा को
गधे का मूत पिलाकर
बस्ती में
कैसे कैसे घुमाया गया था
बाबा की मजार वाली सड़क से
पुल पुख्ता तक
कि —
किन किन की पगड़ियां
घोड़ों की टापों से
रौंदी गई थी बियाबान में
कि —
किन किन की आंखों में
प्यार के सपनों की जगह
गर्म सलाखें रखी गई थी
आज भी
कहते हुए सुने
जाते हैं वे लोग
जिनकी सुहाग रातें हुजूर को परोसने के बाद
जूठी पत्तल की तरह
लादे हुए जश्न के साथ सम्हालकर घर लाई जाती थी
वे भी हैं
जिनके कोई भी अंश
कोई भी अहसास
कोई भी इरादा
अपना नहीं होता था
राज रुचि की
पालकियां ढोने वाले
मट्ठर कन्धों से
आज भी —
चाहे जब उठने लगता है
खुजली का इतिहास
छलछला उठता है
काले खून का भूगोल
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वे तमाम पत्थर
जो रियाया है गढ़ की
आज भी
अपनी उन्हीं पुरानी आंखों से
महल के तामझाम को देखने में मस्त हैं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत “लंबी कविता —” राजमहल की खरीद के साथ ” का —-अंश —३ )
आज के कविता अंश में कविता राजसत्ता के हांजी नाजी और मनमर्जी के उसूलों की बर्बरता और क्रूरता का खुला इतिहास किंवदंती और किस्सों के रुप में खोलती है ।कविता विगत से आगत याने वर्तमान समय की ओर भी गहरे संकेत करती चलती है ।राजा की अनुमति के बिना जहां जीवन जीना बेहद मुश्किल हो जब निजी जीवन की उसकी भावनाओं का उसके अहसासों के भी मायने राजसत्ता के सामने बेमायने और अपने अहमियत भरे अर्थ खो दे उस सत्ता को जनहितैषी या जन हितकारी कैसे समझा जाये ।राजा को गुस्सा आया तो आदमी को बिना कसूर के हवालात में डाल दिया जाये ,घोड़ों की टापों से रौंदा दिया जाये और आदमी के मान – सम्मान को नष्ट करके उसे उसकी ही नज़रों में आत्म ग्लानि और आत्म हीनता की आत्म अनुभूति में जिन्दा रहने को मजबूर कर दिया जाये ।यह है राजतंत्र ।ऐसे भी बहुत से राजसेवक होते रहे जो केवल राजसत्ता की पलक झपकने के साथ अपनी हरकत ,अपनी चेतना,अपनी विचार क्षमता को बिल्कुल जड़ -गौड़ से जुड़ी रखते थे ।राजा के होंठ हिले और जनसेवक या अंध भक्त इच्छापूर्ति के लिए दौड़ पड़ते थे ।ये सब विगत का इतिहास है लेकिन आज भी आदमी की सेवक की प्रवृत्ति में कोई अन्तर नहीं आया ।कविता की ये पंक्तियां यहां गौर करने लायक है —“आज भी /चाहे जब उठने लगता है / खुजली का इतिहास / छलछला उठता है / काले खून का भूगोल / वे तमाम पत्थर /
जो रियाया है गढ़ की / आज भी / अपनी पुरानी आंखों से / महल के तामझाम को देखने में मस्त हैं /”
सचमुच आदमी चाहे जैसी क्रूरता बर्बरता के भीतर से सांस प्रश्वास ले रहा हो पर उसका उस व्यवस्था से उस यथास्थिति से जल्दी मोहभंग नहीं होता ।उसकी चेतना वैचारिक निष्क्रियता से इतनी ज्यादा ग्रस्त हो जाती है कि उस मानसिक दशा से मुक्ति या निकलने के बारे में वह त्वरा के साथ सोच नहीं पाता ।वह मोह ग्रस्त रहते हुए विकृति को ही एक लम्बे समय तक सहता रहता है ।पीड़ा होती है लेकिन विकल्प पर विचार स्थिर नहीं कर पाता और ना ही वह विकल्प के लिए जोखिम उठाने का ही साहस कर पाता है । इसीलिए बदतर को ही बेहतर मानकर उसी को अपने अनुकूल करते रहने की कोशिश करता है । राजतंत्र की राज रुचि की पालकियां ढ़ोते ढोते रियाया पत्थर हो गयी ।उस पर स्थितियों ने असर डालना बन्द कर दिया ।या यों कहें कि जनता पूरी तरह से मतिभ्रम में डूब चुकी होती है और उस जड़ता की मनोदशा में वह हलचल और हरकतों खुद की और राजसत्ता की भी से निश्चल रहती है ।यह हरकत शून्यता ही तो वैचारिक जड़ता है जो यथास्थिति का घेरा टूटने नहीं देता और समूची जनता वैसे व्यवस्था बोध से अनभिज्ञ ,अनजान और अजनबी रहती है ।चेतना का बदलाव ही जनता को जड़ता से उबारता है और मोहभंग की दशा तक पहुंचाया है । काले खून अर्थात गुलाम मानसिकता का भूगोल यह देह यह तन यह शरीर । लंबी कविता का शेष और अन्तिम अंश कल दिनांक १४/४/२४ को
विनीता रघुवंशी
