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राजमहल की खरीद के साथ
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लंबी कविता का —अंश —-२
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तलघर का रास्ता
जो भ्रम से नजरबाग तक
जल -प्रपात की फुहारों में
हमेशा इन्द्रधनुष रचता था
फिर से खोल दिया गया है
पीछे से प्रवेश के लिए
और राजा के जमाने के
सांप -बिच्छू
गिरगिट -गोयरे
गुम्बद की पोलों में गुटर गूं करते कबूतर
अंधेरे हालों में लटकी बनबागुरें
उल्लू -घनचिरैया
बढ़ते मकड़ जाल
ऊपर – आसमान छूती छत पर
धीरे – धीरे
हड्डियां बढ़ाता हुआ बाज का जोड़ा
चील -कौओं के झुण्ड
सब के सब
राजमहल की खरीद के साथ
हो गये हैं सरकारी !
बिना किसी
स्टाक रजिस्टर में चढ़े ये सब
विरासत की तरह
बाकायदा सौंपे जाते रहे हैं
सल्तनत –दर -सल्तनत -हर बार
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गाता है जब भी हरबोला
कि कहां कहां
कैसी कैसी फांसी लगती थी
राजरंजन के लिए
बारी -बारी से
मेरु – बागरु- भीगूं को
ऊंट या हाथी के पीछे बांधकर
कैसे – कैसे घसीटा जाता था
बस्ती का वह नेता
पता नहीं
कितना प्रतिशत राजवंशी है
बेनजीर बाग की
ऐशगाहों में बची शिनाख्तें
अब भी जब तब
कुछ बोल देती हैं
लंबी कविता –राजमहल की खरीद के साथ —- का अंश —-२
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
” राजमहल की खरीद के साथ ” के विषय में एक उल्लेखनीय बात यह है कि इस कविता छाया मंचन की टेक्नीक से कुछ युवाओं की छाया पर्दे पर उतार कर कविता कोश मंचित करने का प्रयोग राजगढ़ जिला मुख्यालय पर उस समय के उभरते नाट्य निर्देशक और आज नाट्य निर्देशकों में स्थापित नाम धन्य श्री कमलेश सक्सेन जी ने यह प्रयोग प्रस्तुत किया जिसको बहुत सराहा गया ।
आज की कविता के अंश में यह तथ्य उभर कर आता है कि चाहे तंत्र भले कोई भी हो आदमी की वृत्तिया हर काल हर युग में लालच और स्वार्थ से भरी ही रहेगी ।कविता में राजतंत्र की खामियां उजागर हुई है तो यह भी प्रासंगिक हो गया कि राजवंश की तासीर में ही क्रूरता बस्ती है ।राजा अपने मनोरंजन के लिए सजा और दण्ड के नये नये तरीके खोजा करते थे ।घोड़ों की टापों से कुचलवाना,हाथी के पैरों तले दबाना या ऊंट की पूंछ में बांधकर घसीटना ये सब राजा के मनबहलाव के साधन थे ।इसी तरह शेर आदमी की लड़ाई के खेल भी राजरंजन के मकसद से रचे जाते थे इनमें आदमी की निर्दयता और निर्ममता को राजा के साहस ,शौर्य,और दम-खम का पैमाना होता था ।राजमहल के खाली कोनों और नीरव माहौल में बसेरा किये सांप -बिच्छू गिरगिट,गोयरे,कबूतर, बनबागुरें सब के सब राजमहल के बिकते ही अब ये सरकार की मिल्कियत हो गये ।याने ये प्रतीक हैं उन वृत्तियों के जो प्रकृति ने इन्हें दिया लेकिन आदमी ने अपने को चतुर और चालाक बनाने के लिए अपने स्वभाव में उतार लिया ।आदमी ने सांप से षड्यंत्रों का जहर की बूटी दबा ली अपनी दाढ़ी में ,गिरगिट से समयानुकूल रंग बदलना सीख लिया , गोयरे से चिपकना सीखा ,बन बागुर से अंधेरे में भी स्वार्थ को साधना सीखा ।हर पक्षी हर जीव जन्तु का स्वभाव लिए आदमी राजमहल की खरीद के साथ ही अपनी प्रवृत्तियों को लिए सरकारी महकमों का बाशिन्दा हो गया । तंत्र चाहे राजवंश हो या जनतंत्र आदमी का आदमी के साथ संबंध निर्वाह गैर इंसानी ही रहेगा । उसके स्वभाव में मुलायम नरमी और कोमलता की बनिस्बत क्रूरता और निर्ममता ही रहेगी । राजतंत्र में राजा की मर्जी ही कानून और नियम होते थे । इसलिए स्त्री भोग की मर्यादा और राजभोग के बाद ही सामान्य जन अपनी गृहस्थी का सिलसिला शुरु कर पाता था ।यह संकेत है राज इच्छा की सर्वोपरिता की ।जब जब भी वल्दिया तलाशी जाती है समाज में तो अंगुली संकेत राजमहल के अन्दरुनी रहस्य स्वत:उजागर हो जाते हैं ।कुछ शिनाख्तें से यहां आशय है कुछ बचे खुचे राज दरबारी , राजकर्मचारी ,या राज घरानों से जुड़े कुछ जौहरी , कुछ बजाज,कुछ मसालेबाज व्यापारी ।ये सब राजघरानों और वंशों से जुड़े किस्सों के बखान करने वाले अब भी शेष हैं तो महल की जिन्दगी भी रंजक बनी हुई है ।(कविता का शेष अंश कल दिनांक १३/४/२४ को )
विनीता रघुवंशी ।
