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राजमहल की खरीद के साथ
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लंबी कविता का— अंश –१
घुमावदार घाटी की
छाती पर खड़े
राजमहल के सुनसान दरबारे खास
और रनिवास से
रात बिरात घोर अन्धकार में
जब भी सुनाई देती है
घुंघरुओं की झनकारें
घुटी -घुटी चीखें
प्यालों की खनक
कहहकों के बीच
पकते हुए भारत की गंध के साथ – साथ
अब भी
ऊंचे स्वरों में उठते हैं
हुजूरे आलम के गीत
हर बोलों के लरजते कण्डों से
फिर से बिछने लगते हैं कालीन
संगमरमरी फर्श पर
डगमगाते पांवों की
चहल कदमी के लिए
फिर से सजने लगती है सीढ़ियां
थकीहारी वेश्याओं जैसी
जो अपने ऊपर से
जाने किन – किन को
सिंहासन से चढ़ाती -उतारती रही हैं
जबकि पगली रानी के मरते ही
यह महल
सरकारी महकमों के
दफ्तरों में तब्दील हो गया है
इन दफ्तरों के अपने -अपने सूत्र
बड़े बड़े तख्तों पर
सुन्दर हरुफ में लिखे
बाहर लटके हैं
जो वफादार कुत्तों की तरह
आगंतुकों का स्वागत करते हैं शायद !
(कविता का शेष अंश –१२/४/२४ को )
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
भारत बहुत प्राचीन काल से ही राजवंशों के नेतृत्व में सत्ता का धर्म,अनुशासन,जय -पराजय ,रीति – रिवाज,परम्परायें ,सब राजा की इच्छा ,राज मंशा और राज आज्ञा के अनुरुप निर्वाह की जाती थी ।सत्ता का समस्त कामकाज राज वंशों की मतानुसार जनता को पालन करना होता था ।आजादी के बाद हमारे यहां राजवंशों की विशिष्टता के प्रतीक प्रीवीपर्स खतम किये गये और पूर्ण प्रजातंत्र की बुनियाद रखी गई ।यह राजवंशों की विशिष्टता ही हमारी पराधीनता का बहुत बड़ा हेतु भी रही ।छोटे छोटे राजवंश अपनी साम्राज्य लिप्सा की पूर्ति के लिए जिस – तिस से हाथ मिलाते रहते थे जिसके कारण समग्र भारत का एक सार्वभौमिक स्वरुप नही निर्मित हो पाता था ।जब भारतीय समाज अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए संघर्ष करने लगा तो राजवंशों के छोटे स्वार्थ और हित उसमें अवरोध उत्पन्न करने लगे ।राजवंश अक्सर भोग विलास में डूबे रहते थे और चाटुकारी साजिश षड्यंत्र सब हथकण्डे अपनाकर सत्ता हथियाने का खेल चलता रहता था ।राजा में चाहे ज्ञान हो न हो , चरित्र हो न हो ,गुण हों या न हो ,नैतिकता और मूल्य हो या न हो लेकिन वंश परम्परा के निर्वहन में जिस किसी को राजगद्दी सौंप दी जाती थी ।कविता ऐसे ही गुणहीन राजा के राजकाज की हकीकत बयान करती सी प्रतीत हो रही है ।यह महल चाहे राजगढ़ जिले मुख्यालय पर स्थित हो या भारत के किसी अन्य भूखण्ड पर सभी राजवंश रागरंग भोग विलास रंगमहल और रनिवास के ही किस्से बताते हैं ।कोई राजवंश क्यों डूबा? महल क्यों बिका या उसपर किसी का कब्जा क्योंकर हुआ?सबके पीछे एक ही वजह होती है राजा गुणहीन था ,राजा भोगी था ।राजगढ़ का महल भी नाकारा राजा और चाटुकार कर्मचारी की लालच भरी नीयत ने वफादारी की कसम खाकर भी चार -पांच एकड़ में फैले राजमहल को पानी के मोल में बेंच दिया ।कीमत थी पांच लाख रुपया और महल सरकार का याने भारतीय स्टेट बैंक के अधीन हो गया ।राजा का नाकारा पन उस दिन जनता के सामने उजागर हुआ और वफादारी का भेस और भेद भी उस दिन छुपा ना रहा ? जनता संताप से व्यग्र हुई और विकल अनुभूति रचना के रुप में प्रकट हुई ।राजवंश के प्रतीक राजमहल का यों सस्ते में बिकना राजगौरव के प्रति आसक्ति का अनुभव है ।इससे यह भी जाहिर होता है कि राजवंश के उत्तराधिकारी कितने लापरवाह और गैरजिम्मेदार रहे होंगे और राजकर्मचारी की वफा और निष्ठा भी कितनी नाटकीय रही होगी ? दफ्तरों का राजमहल में खुल जाना भी उनके हालात की हकीकत दर्शा रहे हैं ।हर दफ्तर अपने सूत्र वाक्य और योजनाओं की घोषणाएं तख्ती पर लिख कर चस्पा कर चुकी है ।ये योजनाएं ही वफ़ादार कुत्ते की तरह पट्टा डाले आगंतुकों का स्वागत कर रही हैं ।बस भौंका जा रहा है ।परिणाम सिफर है ।यही हर सरकारी महकमें की हकीकत रह गई है ।
विनीता रघुवंशी
