मित्रवर ******* बहुत दिन हो गये न नदियों को हवा खाते देखा न पहाड़ों को पानी पीते न जंगलों को आग खुरचते न बीजों को माटी मिलते बहुत दिन हो …
पकी फसल के बीच
जब ***** खिल गये धरती आकाश धूप के पैदा होते ही बजने लगे नगाड़े घटाओं के पानी के जनम पर कण कण हो गये गतिवान हवा के अवतरण पर धूप …
वक्त ***** यह बगीचे को नहलाने का वक्त है वक्त है — भीगे परिधान में सद्यस्नात लताओं का पंखों में आकाश भरने का वक्त है चिड़ियों का वक्त है तितलियों …
महक ***** दिनों बाद मां मिली तो खिलते रहे देर तक रोम रोम स्वप्न में स्वर्गीय पिता दिखे तो आकाश- सा फ़ैल गया माथे पर आशीर्वाद भाइयों से भेंट हुई …
परेड ग्राउंड पर —५ ****************** (लंबी कविता का अन्तिम अंश ) देश ! जमुहाई नई लगेगा दिल – दिमाग नई लगायेगा हक की आवाज नहीं फेंकेगा पेट नई पकड़ेगा संस्कृति …
परेड ग्राउंड पर —४ **************** दांत नई निपोरेगा हंसेगा तो बंट की ठोकर खायेगा और विदेशी मेहमान के सामने ही मलयज शीतलाम उसांसें छोड़ता हुआ पूरा बत्तीसी बाहर आ जायेगा …
परेड ग्राउंड पर –३ *************** देश ! विश्राम !! देश, महामहिम के आगे अपनी मरी खाल के ढोल पीटेगा अपना मुर्दा मार्च पास्ट दिखायेगा देश! सावधान !! सरकारी ढोल पीट …
परेड ग्राउण्ड पर –२ ***************** देश ! लेन बनाने के लिए एक दो तीन बोलेगा देश ! तीन तीन की लेन में तेरह तेरह खड़ा होगा देश ! तीन तेरह …
