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विनीता रघुवंशी
महक
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दिनों बाद मां मिली तो
खिलते रहे देर तक रोम रोम
स्वप्न में स्वर्गीय पिता दिखे तो
आकाश- सा फ़ैल गया माथे पर आशीर्वाद
भाइयों से भेंट हुई तो
क्षितिजों तक लंबी हो गई भुजाएं
अर्से बाद बहनें मिलीं तो
राखी का त्यौहार हो गया मन
नाती – पोतों को पाते ही
कनियां – कनियां भर गया आंगन
देखो तो !
धूप दीप जैसा
कितना- कितना महक रहा है घर !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में महक की नैसर्गिक अवस्था रिश्तों में ही है ।आज जब हम सब पश्चिमी सभ्यता के मोह में पूरी तरह डूब चुके हैं ऐसे समय में अपने जीवन की उम्दा महक को पा जाने की अनुभूति कितनी – कितनी गहरी है कि मां को देखने भर से रोम – रोम खिल गये । आज के समय में यदि कोई रिश्ता उपेक्षित है तो वह ‘मां’ का ही रिश्ता होता है न तो मां को आदरणीय और पूजनीय माना जाता है न उसका महत्व ही समझा जाता है ।जैसे जैसे मां की उम्र बढ़ती जाती है वह बोझ समझी जाने लगती है ? उसकी सेवा सम्हाल और खिलाने – पिलाने का ध्यान कम होता जाता है । आज मां का रिश्ता विरासत और अन्य वस्तुओं के वितरण पर आकर टिक गया है — जैसे गहने , सम्पत्ति ,जमीन – जायदाद ,पेंशन ये रिश्ते की बुनियाद बनती जा रही है ।क्या एक मां के पास इन सबका होना बहुत बहुत जरुरी है ? क्या उसका केवल और केवल “मां ” होना ही जरुरी नहीं ? जब हम “मां ” शब्द का उच्चारण करते हैं या” मां ” को पुकारते हैं तो दुनिया जहान में बसी “मां ” पीछे मुड़कर देखती है ।यह “मां “का होना है सृष्टि का होना । सृष्टि की हर मां जो चौरासी लाख योनियों की सिरजन हार है वह सब” मां ” लोकधर्मी रुप में रुपायित है ।”मां ” एक शब्द भर नहीं है ।यह उस लालन – पालन करती समष्टि की चेतना है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है ।स्वार्थ से परे निस्वार्थ सेवा और प्रेम का अनुनिनाद है “मां ” यहां यह भेद करना भी उपयुक्त नहीं कि स्त्री की माता या पुरुष की माता ।माता का पद और सम्मान दोनों स्थानों पर सर्वोच्च और सर्वोत्तम ही होता है । इसीलिए जो मां रोम रोम में बसी है उसके मिलते ही रोम रोम तो खिल ही जायेंगे ।यह तो स्वाभाविक प्रेम का नाद और अनुरणन है ।मां को गहराई से आत्मानुभूति बनाती यह रचना हमारे जैविक दृष्टिकोण को ही विकसित और वैचारिक बना देती है ।स्वप्न में स्वर्गीय पिता का दिख भर जाना किस तरह आशीर्वाद का फैल जाना है ।पिता संरक्षण , दायित्व और कर्मठ जीवन के प्रतीक होते हैं ।पिता का होना मनुष्य का बेफिक्र और निश्चिंत हो जाना है ।पिता की देखरेख और मार्गदर्शन दोनों आदमी को बेहतर से बेहतर जिंदगी देने का सबब होता है ।पिता उदाहरण भी होते हैं और सबक सिखाने वाले शिक्षक भी इनकी कठोरता ही मनुष्य जीवन का वास्तविक अनुभव जगत में प्रवेश कराने वाला होता है ।पिता का संरक्षण भाव अवाक आशीर्वाद होता है ।मां यदि कोमल भावनाओं की पहचान होती है तो पिता अनुशासन ,नियम ,उसूल, और कर्तव्य का बोध कराने वाला रिश्ता होता है ।भाइयों से भेंट हुई तो भातृभाव की अनुभूति ने भुजाओं को लंबा कर दिया ।भाई गले लग कर आलिंगन बध्द हो गये ।सारा ईर्ष्या भाव ,समूचा मनोविकार कहीं जन्म ही नहीं ले सका ।क्या ये अनुभूति राम और भरत के मिलाप का अनुभव मन में नहीं रच देती ।यह है विकार हीन रिश्तों की आत्मानुभूति ।भुजाएं ऐसी प्रतीत हुई मानो उसमें क्षितिज समा गये हों ।यह कल्पना कितनी कितनी विकार हीन और चेतना से भरी है । जहां रिश्ते प्रेम और आत्मीयता के पर्याय बन कर महसूस किये जाते हैं वहां मनोमालिन्य कैसे रह पायेगा ? आधुनिक जीवन शैली एकल परिवार के विचार की बुनियाद को समाज में रख रहा है ।यह विचार भी पनप रहा है कि सीमित परिवार सुखी परिवार । लेकिन यह सीमित परिवार की जो दुनिया है वह मनोविकारों से रोगिणी है । यहां आत्मीयता के सभी रिश्ते अपना स्वरुप खो चुके हैं ।ऐसे में बहनों का मिलना रक्षाबंधन का अनुभव कराने वाला है और नाती -पोते से कनिया कनियां आत्म सुख से मन का ,आत्मा का भर जाना कितना सुखद है । सच है रिश्ते घर – आंगन की महक होते हैं इन्हें धन – दौलत ,पूंजी , सम्पत्ति ,खुद गर्जी से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए ।परिवार ही सबसे बड़ी दौलत होता है ।नानक देव ने परिवार का आधार बताते हुए कहा भी है — एक ने कही ,दूजे ने मानी ।
नानक कहे ,दोनों ज्ञानी ।। यही ज्ञान परिजन और रिश्तों को सदा बहार बनाए रखता है ।
