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विनीता रघुवंशी
वक्त
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यह बगीचे को नहलाने का वक्त है
वक्त है —
भीगे परिधान में सद्यस्नात लताओं का
पंखों में आकाश भरने का वक्त है चिड़ियों का
वक्त है तितलियों के फुदकने का
माटी के महकने का वक्त है ये
वक्त है घाटी के चप्पा चप्पा चहकने का
पेड़ पौधों के खिले चेहरों पर
बौछारें उछालने का वक्त है
वक्त यह घास पर नंगे पांव घूमने का है
वक्त यह माली के हाथ चूमने का है
यह जलाशयों से उठती सूर्यमुखी भाप से
जलतरंग सुनने का वक्त है
वक्त है बूंदों की थाप पर मेघ मल्हार का
वक्त है वनस्पतियों के सम्हाल – सिंगार का
यह चेनुओं -चींटियों को चुगाने का वक्त है
वीरबहूटियों को संताप से उबारने का वक्त है
वक्त है फूल -पत्तों के बचाव का
वक्त है हरियाली के बचाव का
वक्त यह धार धार पानी सींचने का है
वक्त यह सृजन – गंध उलीचने का है
वक्त है – – – यह वक्त है – – !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में उस समय की चर्चा है जब सब कुछ आधुनिकता,तकनीक, और यांत्रिक ,भौतिक उन्नति के नाम पर परम्परागत मानवीय जीवन के लिए जरुरी जीवन स्थितियों को नष्ट किया जा रहा है । यहां तक की भौतिक विकास के नाम पर जिस मनुष्य को सुखी बनाने की कोशिश की जा रही है उसी मनुष्य के आस पास मानव घाती ,उसी को नुकसान पहुंचाने वाली स्थितियां बनाई जा रही हैं । इसीलिए कविता में यह चेतावनी सी गूंज रही है कि मनुष्य के आसपास से सब कुछ खतम हो जाये उसके पहले उसे बचाने का अब भी वक्त है ? क्या भौतिक – यांत्रिक सुख में खोया आदमी अपने लिए अब भी सावधान हो सकेगा कि वह अपने बाग – बगीचे बचाने को तत्पर होगा ? यह बगीचा क्या है? किसका प्रतीक बनकर आया है ? बगीचा है ।समाज ।बगीचा है देश ।बगीचा है परिवार ।बगीचा है युवती ।बगीचा है युवक ।इनके भीतर पनपती मनोवृत्ति ।ये किस भावनात्मक सूखेपन से गुजर रहे हैं ? इनके पास बौध्दिक ज्ञान से भरी सूचनाएं तो हैं पर व्यवहारिक वह आत्मीयता ,लगाव , प्रेम, की भीगी भाव धारा की अनुभूति और अनुभव दोनों नहीं है ।क्या यह वक्त इन्हें इनकी उस जिन्दगी के अहसास को नहीं कराया जाना चाहिए । भावनाओं के अभाव के कारण ही आज का आदमी अपने छोटे – छोटे लाभ और स्वार्थ की पूर्ति करने के लिए देश को ,समाज को , परिवार को ,व्यक्ति को बड़े से बड़ा नुकसान पहुंचाने के लिए तत्पर हो जाते हैं । थोड़े से रुपये या राशि के लिए बारुद और बम तमंचे सब का उपयोग कर बैठते हैं । यह मनोदशा समाज के लिए घातक है । आज जरुरत है उस अहसास की ,उस कोमलता की जो प्यार की ललक में डूबी हुई हो ।पंखों में आकाश भरने वाली उड़ान चाहिए याने हमारे युवाओं के मन में स्वप्न हो जागती आंखों के ,बेहतरी के , बदलाव के , एक कर्मठता हो चेतना के साथ जो यह महसूस कर सकें यह देश मेरा है ,यह समाज मेरा है ,यह समय मेरा है , यह परिवार मेरा है , यह मेरा जीवन है ।यह मेरी जिन्दगी है ।यह गहरी अनुभूति जब हर मन में होगी तब ही तो यह समय सब के अनुकूल रहेगा । आज भौतिकता ने ,यांत्रिकता ने , आधुनिकता ने जो प्रहार हमारी जीवन शैली को धुरी शून्य करके किया है ।क्या हम उस सब के प्रति सचेत हैं ? क्या हमने कभी चेहरों की खिलखिलाहट को महसूस किया ।? क्या हमने कभी मन को उन्मुक्त करके कभी जीवन की अल्हड़ता को जीने की कोशिश की? यह सब अनुभूति और अनुभव तो बिना तकनीक ,बिना विज्ञान ,बिना यंत्रों के भी जी जा सकती है ।यह तो वह अनौपचारिक जीवन शैली है जहां तकनीक या ज्ञान की जरुरत नहीं , जहां धन – सम्पदा या बुध्दि की ज्यादा जरुरत नहीं ।बस जरुरत है सद्यस्नात भीगी लता के लावण्य मय रुप को जानने समझने की ? क्या आज का मनुष्य इतना रुखा – सूखा और हृदय हीन हो गया है कि उसे जीवन के स्पन्दन और लगाव भरे सौन्दर्य के अनुभव भी अविचल रख पा रहे हैं ? उन सौन्दर्य में डूबे उस प्राकृतिक और नैसर्गिक भाव धारा को भी हम अनजान बने देख सुन नहीं पा रहे ?जब सारी दुनिया मिटने की कगार पर खड़ी है ऐसे वक्त में उसे बचाने की चिन्ता तो हर संवेदन शील मनुष्य के मन में उठनी ही चाहिए । इस समय, अब भी ,अभी भी, वक्त है कि दुनिया से भाव के नाश की स्थितियां पैदा हो उससे पहले इस दुनिया के भावहीन हो जाने के पहले भावनात्मक संसार को बचा लिया जाये ।अभी भी वक्त है ।यह वक्त है भावनाओं और मूल्यों को ,नैतिकता को बचाने का ? यदि मनुष्य सामाजिक प्राणी है तो उसके लिए भावनात्मक संसार भी उसकी महती जरुरत है ।सब कुछ विज्ञान यांत्रिकता, भौतिकता, बुध्दि मनुष्य के भीतर से सोख ले जायें उसके पहले मनुष्य को अपने आपका संरक्षण करने के लिए जागृत होना होगा ।बहुत सारी गतिविधियां उसे भाव जगत में पुनः स्थापित करनी होगी ।उसे प्रेम का वास्तविक अर्थ समझना होगा ।प्रेम एक मानवीय मूल्य है ।जो समग्र विश्व में चेतना का पर्याय और सर्वजनीन है । सार्वकालिक है । सर्वहितकारी है ।अब भी वक्त है ।यह वक्त है ।सावधान होने का ? क्या मनुष्य अपनी संवेदना ,अपने प्यार , अपनी करुणा ,अपनी दया ,अपनी सेवा की निर्मलता को बचाने के लिए सचेत होगा ? आज विज्ञान ने मनुष्य के जीवन में हस्तक्षेप किया और उसे नैतिकता और मूल्यों के छद्म संसार में भटकने को अकेला छोड़ दिया है ।आज का मनुष्य अपने दु: ख की अभिव्यक्ति घुटन भरे अन्धेरे कोनों में करता है ? संताप और व्यथा गहरी खाइयों का सबब हो चुकी है ।ऐसे बुरे समय में यदि कुछ बेहतर हो सकता है तो आदमी को अपने लगाव प्यार ,स्नेह के अहसासों को बचाने के प्रति सतर्क तो होना ही होगा ।
