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जानकारी-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
जानकारी
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तुम वही कहोगे
कि —-
पत्थर हैं ये
यदि बदले
तो —
रेत ही तो बनेंगे भुरभुरी !
रेत : खरबूजों की
बाड़ियां लगाती
धीवरों की
अथाह जल राशि में विचरती
पत्थर जिंन्दगी में
पुरखों का
कर्ज पटाने वाली
क्षणिक हरियाली बनती है
(और फिर —
‘जल बिन मीन पियासी ‘ रही आती है )
या —
जो सीमेंट से
मिल कर
ठण्डा नीर पीती हुई
नक्शों को
निर्माण में बदलती है
परम्पराओं को
संस्कृतियों -सभ्यताओं को
छांव देती है
वहीं ठेकेदारों का चरित्र बन कर
मुंह में गुटका दबाये
मोटर में बैठ कर
मेम्बर साहिबा बनी
भवनों तक पहुंचती है —तो
योजनाओं के कजरारे नयनों में
किरकिरी पैदा करती है
पत्थर को
जड़ समझने से पहले
यह जानना जरुरी है
कि —
कितना – कितना
चेतन है वह !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
पत्थर प्रतीक है जन मन का ।जन को निरा जड़ समझने वाले उनकी चेतना ,उनके बोध का अन्दाजा नहीं लगा पाते हैं ।हर मनुष्य अपने जीवन को अपने जीवन बोध और जीवन स्थितियों के साथ तालमेल बैठा कर जीता है । यह जन मन पत्थर की तरह जड़ नहीं है ।और न ही ये बिखर कर केवल रेत की मानिंद छोटे छोटे कण में ही बदलेंगे वरन ये बिखरे हुए रेत कण भी इतने उपजाऊ हैं कि इनसे खरबूज तरबूज की बाड़ियां लगाई जा सकती है ।धीवरों की याने जो जाति नदियों के किनारों और तटों पर निवास करती है उनके लिए आजीविका उपार्जन की जीवन रेखा बने ये रेत कण उनके पुरखों के द्वारा लिए गये कर्ज- ऋण के चुकाने का सहारा है रेत ।क्या यह रेत अपने सार्थक कण कण को क्षण भर के लिए ही हरा भरा बनाती है वह कम मामूली तो है नहीं ।या फिर यह रेत इमारत बनाने में भी मदद करती है ।इन भवनों में इमारतों में घर से लेकर सदन,भवन में संस्कृतियों परम्पराओं ,सभ्यताओं को संरक्षित रखा जाता है ।और तो और यह ‘रेत ‘ यहां रेत शब्द अपना अर्थ रुपान्तरित करता है ।रेत जन में बदल गयी और जन नेतृत्व करने वाले जन -प्रतिनिधि में मेम्बर साहिबा बनकर कविता की चेतना को एक नये बदलाव के साथ उभारती है ।यह जन -प्रतिनिधि उस भ्रष्ट तबके का नुमाइंदा है जो दलाल बना लोक और तंत्र को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करता है ।दलाल का वह समूचा किरदार कविता में उभर कर आता है । इसीलिए जो लोग यथास्थिति में रचे बसे हैं उन्हें मूर्ख या जड़ नहीं समझा जाना चाहिए ।ये जड़ नहीं है कि इन पर हालात ,घटनाएं, माहौल बेअसर होते हैं। इनमें भी बोध है ।ये भी बेहतरी के हालात अपने आसपास गढ़ना चाहते हैं ।इनमें भी बदलाव की चेतना और चिन्ता है ।इन्हें चेतना हीन या जड़ नहीं समझना चाहिए ।इनके बोध को जानना समझना ही जन स्पन्दन को समझना है ।ये धड़कन से दूर नहीं वरन धड़कने इनके वजूद को दृढ़ ,सख्त और ठोस वैचारिक जमीन से जोड़ती है ।इनकी चेतना का स्पन्दन मामूली नहीं बहुत तीखा और पैना है ।दर्द और पीड़ा से भरपूर अनुभव और अनुभूति की गहराई से रचा हुआ ।
🙏विनीता रघुवंशी

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