10
सतपुड़ा और उसकी बेटी नर्मदा
**************************
तुम्हारी ठोस चट्टानें
धरती के
आदिम अस्तित्व का प्रमाण दे रही हैं
पेड़ -पौधे – लताएं
घास – फूस
कोमल रोएं हैं तुम्हारे
और सांवला शरीर
कहानी है फौलादी
इसी कहानी को
आकार देने के लिए
जुटे हैं मजदूर
अपना खून -पसीना एक करते – खदानों में
नर्मदा !
तू इस कदर चिंघाड़ क्यों रही है ?
जबकि पूरा पहाड़
तुझमें ही देख रहा है अपना चेहरा
इतने बड़े आसमान के नीचे
वे लोग
जो सतपुड़ा के संग साथ जन्में थे
आज भी
अपनी संतानों के साथ नंगें हैं
पहाड़ में बोते हुए दु:ख
जिसे अपना
आनंद मान लिया है इन्होंने
ये कब तक
मेमनों की तरह पीते रहेंगे
चीतों की गुर्राहट?
कब तक बने रहेंगे बुत ?
कब रगड़ेंगे पत्थरों को आपस में
कि जिनसे —
अंधेरी गुफाओं के भीतर
जन्म ले उजाला
कब होंगी
तेरी धार
चाकू छुरी गुप्ती या तलवार की तरह !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता उस आदिम अस्तित्व के साथ जुड़े पहाड़ नदी जंगल वन सब के अस्तित्व में ही आदमी का अस्तित्व संरक्षित है यह अनुभव कर रही है ।कविता की अन्तर धारा में एक व्यथा ,एक दु: ख ,एक पीड़ा व्याप्त है जो आदिम आदमी से जुड़ी है ।सभ्यता और संस्कृति ने बहुत सारी करवटें लीं ।बहुत सारी खोज और आविष्कार किये ।बहुत सी खोजें मनुष्य के जीवन को सुखी और भौतिक उपलब्धियों के संसाधन से भारत मुक्त हुए ।धरती अपने प्राकृतिक रुप में वैसी ही बनी रही ।पहाड़ और जंगल के बीच विचरते आदिवासी हर हमेशा समान जीवन स्थितियों और न्यूनतम जरुरतों के साथ सांस लेते रहे ।धरती बदली ,आकाश बदला ,सागर तक बदला , नदियां नहरों में बहने लगी ।सागर गैस के भंडार उगलने लगे । वन भ्रमण और पर्यटन के मनोहारी स्थान में तब्दील हो गये पर इन पहाड़ ,जंगल ,वन,नदियों के भरोसे जीते आदिम आदमी के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया ।वे चूपचाप अनमने गुमसुम से पहाड़ों के भीतर अपने दुखों की कहानी छुपाये रहते हैं । गठीला सांवला शरीर और सतपुड़ा की ठोस चट्टानें पहचान है इन्हीं आदिम रहवासियों की ।सतपुड़ा की घाटियों में नर्मदा जीवन रेखा है । नर्मदा की हरहराती चिंघाड़ती धारा के भीतर ही सतपुड़ा अपना चेहरा देखता है ।वह सांवला गठीला आदिम आदमी यहीं इसी के आकार -प्रकार में अपने आपको सजीला बनाता है ।जो आदिवासी जंगलों ,पहाड़ों ,पर्वतों ,नदियों , घाटियों का मालिक है वहीं आज मजदूर बना इस भूमि को सिरे रहा है ।यह बेहद गंभीर बात है कि जो आदिम आबादी जंगलों पहाड़ों नदियों के साथ साथ ही जन्मी हैं ।वे आज भी भूख और ग़रीबी और वस्त्रहीन बनी सतपुड़ा में रह रही है ।नर्मदा की अजस्र धारा ने बहुत सारी बस्तियों का कायाकल्प कर दिया है , लेकिन आज भी सतपुड़ा के आदिवासी निर्वस्त्र हैं ।भुखमरी और ग़रीबी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं । नर्मदा के भरोसे आदिवासियों की स्थिति कितनी कारुणिक है कि इन्होंने अपने दु :ख को ही आनंद में परिवर्तित कर लिया है । आंसू हरकतें हैं और ये उन्हें हथेलियों से पौंछ लेते हैं ।इनके जीवन की व्यथा ये आदिम जन पहाड़ों में बीज की तरह बो देते हैं जिन्हें इनकी पीढ़ियां फसल की तरह सम्हालती रहती है याने दु: ख कम होने का नाम ही लेता ।दु:ख ही आनंद बन गया है ? क्या यह विचारणीय नहीं कि जो आदिवासी जंगलों ,वनों ,पहाड़ का संरक्षण कर रहा है उसकी भी जीवन और जिंदगी बेहतर होनी चाहिए । कविता के भीतर एक बहुत अच्छा सवाल उठकर आया है जो कविता के मायने ही बदल देता है —ये कब तक मेमनों की तरह पीते रहेंगे चीतों की गुर्राहट ? सचमुच जो आदिवासी आदमी है वह हर समय डरा सहमा और भयभीत रहता है ।वह हर उस शहरी से डरा हुआ है जो उनसे थोडे ज्यादा कपड़े पहना है ,जो थोड़ी सलीकेदार भाषा का इस्तेमाल करता है ,जो उनसे अलग ढंग से दिखाई दे रहा है ।जिसका शरीर लुंज -पुंज है लेकिन भाषाई चतुराई उनसे बेहतर है ।ये सचमुच मेमनें हैं ।मासूम हैं ।और स्वार्थ से भरपूर सभ्यता के लबादे ओढ़े शहरी लोग चीते की तरह गुर्राहट से भरे हैं ।कब तक बने रहेंगे बुत ? ये कब तक चेतना हीन आकृति भर बने रहेंगे ।इनमें चेतना का ,आत्म बोध का अहसास कब होगा ? सवाल यही विचारणीय है । कब ये पत्थरों के भीतर दबी आग से उजाला पैदा करना सीखेंगे ।कब रगड़ेंगे पत्थर कि इनकी जिन्दगी की अन्धेरी गुफा में भी चेतना का उजाला फैले ।हे नर्मदा ! कब तेरी धार में वह बदलाव की धार ,तीखा पन आयेगा कि जिनसे इनकी जिंदगी में धार पैदा हो ।याने इनका संघर्ष कब अपने आदिम जनजाति के हित में लड़ना सीखेगा ? ये हर बार संघर्ष करते हैं स्वार्थी ,लालची ,और धन लोलुप समाज के लिए । लेकिन किस दिन ,किस समय ये अपने आप के लिए लड़ना ,संघर्ष करने को तत्पर होंगे ? खुद ही खुद की जीवन – स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए खुद एक हथियार के रुप में ढल पायेंगे ।यह कविता का रुपान्तरण है जो आदिम मनुष्य को एक वैचारिक अस्त्र के रुप में ढलता हुआ महसूस करना चाहती है । विचार का पैदा होना ही एक अस्त्र का बन जाना है ।जब तक मनुष्य विचार शून्य है तब तक वह शस्त्र है जिसका इस्तेमाल हर सत्ता ,हर पूंजीपति, हर शोषक समाज बड़ी आसानी से स्व हित में करता है । नर्मदा के आदिवासी भी चट्टानों की तरह ठोस हैं लेकिन इनमें आत्म चेतना और आत्म बोध का अभाव है । वैचारिक आत्म चेतना ही इनकी सामाजिक अवस्था को बदल सकती है ।आत्म चेतना और आत्म बोध ही वह उजाला है जो इनकी जिन्दगी रुपी गुफा को उजाले से भर सकती है ।सतपुड़ा की बेटी नर्मदा आर्थिक दशा बदल कर भी इनके जीवन को बेहतर रुप में ढाल सकती है ।नर्मदा की ऊर्वरता ही आदिवासी समाज को समृध्दि की दिशा में प्रवाहित कर सकती है ।
विनीता रघुवंशी
