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आंगन बुहारते वक़्त

स्वाधीन भाव से ************* वह अनुशासन में जकड़ा घृणा करना सीख गया और मैं स्वाधीन होकर किये जा रहा प्रेम सभी से । ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता …

लोकतंत्र के आकाश पर ******************* यह सच है कि लोकतंत्र में लोक को चाहे जितना सताओ नहीं बना सकते गुलाम उसे ना ही कर सकते तानाशाहों की तरह वहां कुछ …

प्रहरी ***** तुम यदि देश की सत्ता हो तो प्रहरी हूं मैं तुम्हारे वास्ते भी — और अवाम के लिए भी क्योंकि मेरे अंदर का सूरज कभी डूबता नहीं और …

निर्भिकता ********* वह निर्भिकता के साथ भय की खोज में निकला तो लोगों ने रोका और गले में ताबीज बांधकर टोने -टोटके पकड़ा दिये हाथों में उसके अब निर्भिकता किसी …

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