कद को ही ********** धीरे धीरे फटती रही चादर और हम जीवन भर अपने कद को ही करते रहे उसी के बराबर धीरे -धीरे । ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी …
आंगन बुहारते वक़्त
स्वाधीन भाव से ************* वह अनुशासन में जकड़ा घृणा करना सीख गया और मैं स्वाधीन होकर किये जा रहा प्रेम सभी से । ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता …
लोकतंत्र के आकाश पर ******************* यह सच है कि लोकतंत्र में लोक को चाहे जितना सताओ नहीं बना सकते गुलाम उसे ना ही कर सकते तानाशाहों की तरह वहां कुछ …
प्रहरी ***** तुम यदि देश की सत्ता हो तो प्रहरी हूं मैं तुम्हारे वास्ते भी — और अवाम के लिए भी क्योंकि मेरे अंदर का सूरज कभी डूबता नहीं और …
दोनों दशा में ********** सिर्फ मौत से मरता आदमी —– आज तक नहीं देखा किसी ने न ही जन्म से पैदा होते कभी फिर भी आदमी है कि मरता है …
तब तो ******* क्या पाप से बच्चे पैदा होते हैं ? तब तो सभी हुए पाप से फिर पुण्य से हुए बच्चे कहां से पैदा होते हैं ? पेट से …
निर्भिकता ********* वह निर्भिकता के साथ भय की खोज में निकला तो लोगों ने रोका और गले में ताबीज बांधकर टोने -टोटके पकड़ा दिये हाथों में उसके अब निर्भिकता किसी …
