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तब तो
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क्या पाप से बच्चे पैदा होते हैं ?
तब तो सभी हुए पाप से
फिर पुण्य से हुए बच्चे
कहां से पैदा होते हैं ?
पेट से
तो पेट में ही पाप है
पाप-पुण्य का ?
चाहे जानवर के हों
या मनुष्य के —-
बच्चे तो गर्भ से ही पैदा होते हैं
और सिर्फ मां को ही पहचानते हैं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– “ आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता समाज के ज्वलंत सवाल पर चिंतन, चर्चा ,विचार करने की पहल करती है ।एक नजरिया है समाज में सन्तति के वैध -अवैध होने पर जो एक दम जड़ता भरा है उसी पर कविता में दोनों पक्ष उभारे गये हैं ।समाज जिस तरह बलात्कार की घटनाओं पर खुलकर विचार -विमर्श नहीं करता उसी प्रकार सन्तति के विषय में स्त्री सम्मान की रक्षा नहीं करता ।जबकि मातृत्व धारण करना और सन्तान का पालन करना जितना ही पवित्र है उतना ही स्त्री का परिणय उपरान्त गर्भ धारण सम्मान जनक है किन्तु अपरिणय की स्थिति में वही गर्भ धारण असम्मान और अपमान का कारण बन जाता है ।यह मनुस्मृति की शास्त्रोक्त विधान की अनुशासन प्रणाली,परिपाटी,और परम्परा है । यह विचारणीय है कि गर्भ धारण से जन्मा हर बच्चा केवल सन्तान है ।वह न तो जारज होता है न अवैध वह दोषी कहां है ? फिर उस मासूम के प्रति समाज की कठोर दण्ड के निर्णय ? यह तो उन युगल की कायरता का नतीजा होता है जो अपनी सामाजिक स्थिति को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए और समाज से भयभीत होकर बच्चे के जन्म को अस्वीकार करते हैं ? मुंह दबाकर भागते हैं ।जब संबंध बनाना जायज है तो उसके नतीजे नाजायज कैसे हो सकते हैं ? यह समाज के सामने बहुत कठिन प्रश्न है जिस पर समाज खुलकर और सही वैचारिक ठोस जमीन पर लाने का ख्याल नहीं करता ? समाज के भय से ऐसे बहुत से नाजायज बच्चों को नाली में ,संडास में ,कूड़े के ढेरों में या इधर -उधर फेंक कर गलियों, चौबारों ,आंगनों ,घरों की चारदीवारी में दबी -छुपी जुबानों में स्त्री के दोषों को गिनता रहता है यह स्त्री को कमजोर करने की रीति -नीति है ।करतूत युगल की लेकिन दोषी केवल औरत और बच्चा ? हमारे समाज में यौन संबंधों को लेकर कई धारणाएं चलन में है ।संबंध विवाह बंधन में है तो वे पावन है ।यदि इससे इतर है तो वे नगण्य है ।जबकि हकीकत इससे उल्टी है ।विपरीत दोहरी मानसिकता और मापदण्ड के कारण यह हमेशा रहस्य की तरह अपनायें जाते हैं ।इन पर स्पष्ट बात चीत भी विकार और मनोग्रंथि का कारण बन जाती है ।पर नवजात बच्चे को पाप की सन्तान का टीका लगाना उसकी पहचान को मिटाने की कोशिशें भी अमानवीय है ।वह तो मातृत्व का प्रमाण है ? फिर वह नाजायज या अवैध या दण्ड के काबिल क्यों ? उसका लालन पालन भी माता के गर्भ से ही हुआ है यह मानकर किया जाना चाहिए ।बच्चा अवैध नहीं होता लेकिन सारा दण्ड उसे ही दिया जाता है ? इस कठिन प्रश्न पर समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए ।इसी तरह बलात्कार स्त्री पर हुआ अत्याचार है लेकिन शर्मिंदा भी महिला को ही होना पड़ता है ।पूरा समाज उस पर आक्रामक होता है ।यह अमानवीय आचरण है ।इस पर भी गंभीरता से चिंतन ,विचार और विवेक युक्त दृष्टि बनानी चाहिए ।पौराणिक काल से आज तक नाजायज संतान के प्रति दृष्टिकोण नहीं बदला ।कर्ण कुन्ती की इसी तरह की संतान के रुप में सर्व स्वीकार्य है ।पर यह भी दृष्टव्य है कि कुन्ती समाज से भयभीत हैं लेकिन कर्ण के जीवन रक्षा के प्रति जागरूक हैं इसलिए कवच कुण्डल से युक्त है कर्ण और दुर्योधन से सम्मानित और मित्र की भूमिका में महाभारत का युध्द संचालन करते हुए । इसलिए समाज के सामने खड़े ज्वलंत सवालों पर विचार -विमर्श करने का जोखिम तो जन मानस को उठाना ही पड़ेगा तब ही समाज में स्वस्थ मानवीय दृष्टि और करुणा का वास्तविक रुप स्थापित होगा ।तब ही मनुष्य की जरुरतों के प्रति मानवीय चिन्ता ,चिन्तन, चेतना विकसित होगी ।तब मनुष्यता को शर्मसार करने वाली मां और बच्चों के प्रति दिए जाते दारुण दण्ड पर पाबंदी लगेगी ।विचार करने के खतरे तो चिंतक समाज को ,साहित्य को , बुध्दिजीवियों को उठाने ही होंगे । बिना खतरे उठाये समाज में वैचारिक बदलाव संभव भी नहीं है ।
विनीता रघुवंशी
