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दोनों दशा में
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सिर्फ मौत से मरता आदमी —–
आज तक नहीं देखा किसी ने
न ही जन्म से पैदा होते कभी
फिर भी आदमी है कि
मरता है अपनी करनी से
और पैदा भी होता इसी से
और दोनों दशा में
सौहर भी गाये जाते और
शोक गीत भी उसके लिए ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में जीवन की सार्थकता कर्म से ही होती है ।कर्म ही आदमी की सही पहचान बनाता है ।जीवन कर्म प्रधान ही होता है ।कर्म हीन मनुष्य का जीवन तो संसार में व्यर्थ ही है ।न तो उसके जीवन से किसी को कोई लाभ और न उसकी मृत्यु से ही किसी को नुकसान । आदमी को समाज में संचरण और पहचान यदि किसी कारण से मिलती है तो वह उसकी कर्म शीलता ही है ।सृष्टि में व्याप्त कर्म शीलता के दो रुप चलन में है एक सुकर्म और दूसरा अपकर्म । सुकर्म की श्रेणी में वे काम आते हैं जिनमें आदमी करुणा दया रहम संवेदना और चेतना में समाज उन्नयन की प्रक्रिया को ,प्रणाली को अपनाता है ।ऐसे कर्म जो प्राणी मात्र के जीवन संरक्षण के तथ्यों, तत्वों से परिचालित होते हैं ।जिनमें अहिंसा का भाव सर्वोपरि रहता है । समाज के कष्ट निवारण की भावना और चेतना भरी होती है । अबाल -वृध्द स्त्री और मनुष्य जीवन का लोक चेतना रुप ही सम्मानित होता है ।यही सब सुकर्म है ।प्राणी मात्र की भूख की चिंता ,उनके आराम ,-विश्राम की सुख सुविधा की फ़िक्र ये सब सुकर्म है ।वैष्णव की जनपीड़ा का अहसास ,अनुभव और निवारण की व्याकुलता ही सच्ची मानवता है ।यहां वैष्णव शब्द विशेष अर्थ में प्रयुक्त हुआ है जो भी कष्ट का जन वेदना का अनुभव करता है वह वैष्णव है उसका हिन्दु या किसी धर्म विशेष से जुड़ा होना जरुरी नहीं है । हर वह व्यक्ति जो जन पीड़ा के जनवेदना के स्वर मात्र से मोम की तरह मर्माहत होकर के पिघल जाता है वह वैष्णव है । यह है वैष्णव की व्याख्या ।यह है वैष्णव की सही परिभाषा ,असल परिचय और पहचान । आदमी के सुकर्म भी इसी दायरे में घटित होकर उसे समाज में पैदा करते हैं ।समाज में पहचान दिलाते हैं ।इसी व्यक्तित्व के धनी आदमी को समाज युगों तक अपने में प्रतिष्ठित ,जीवित और स्थापित रखता है । मनुष्य के भीतर समाज के प्रति चेतना कितनी है यही उसे उसके सरोकार के साथ सार्थक बनाता है अन्यथा जन्म लेकर बहुत से इस संसार में आते हैं और अकूत दौलत विरासत ,धरोहर के रुप में कूड़े के ढेर समान छोड़ जाते हैं ।उसी तरह यथा जीवन उदर पोषण करते हैं और बाद में जीवन को मृत्यु के हाथों सौंप जाते हैं ।ऐसे मनुष्यों का जीवन भी मृत व्यक्ति के समान ही होता है जो ” खुद “की चारदीवारी से बाहर ‘पर’ की देहरी के दुःख ,कष्ट से अनजान और अनभिज्ञ रहे आते हैं ।जिनकी चेतना अपने में से पराई पीर तक का अनुमान अनुभव नहीं करती उनका जीना क्या और मरना क्या ? वे न तो कभी पैदा हुए न कभी मरे ।क्योंकि उनके जीवन से समाज अप्रभावित रहा । इसलिए समाज उन्हीं जीवन्त व्यक्तियों को अपनी स्मृतियों में दर्ज रखता है जो समाज के लिए चेतना , चिन्ता,और चिन्तन से भरपूर होते हैं ।समाज जिन स्थितियों को अपकर्म मानता है उनमें आदमी का आदमी को कष्ट देना , भूखे रखना ,गला काटना ,रोजगार छीनना ,नशे का कारोबार को बढ़ावा देना ,मानव समाज के , और प्राणियों को यातना देना ,नारी सम्मान और अबोध शिशुओं पर ज़ुल्म करना ये सब अपकर्म है ।आदमी समाज में यदि सम्मान प्राप्त करता है तो वह उसकी करनी ही है अर्थात कर्म ही हैं ।और यदि तिरस्कार ,अपमान , बेइज्जती झेलता है तो उसमें भी उसकी करनी का ही नतीजा होता है । इसलिए मनुष्य को अपना जीवन समाज में स्थापित रखना है तो अपनी करनी को अहिंसा ,करुणा ,सेवा ,दया त्याग ,संवेदना से जोड़े रखना होगा अन्यथा आदमी के अपकर्म उसे जीते जी मौत का अहसास करा देंगे ।अपमान से मिले जीवन का कोई मोल नहीं वह तो मृत्यु तुल्य ही है । राष्ट्र में हर जीवन का मोल है ।उसमें हमेशा स्पन्दन की तरह वे ही धड़कते रहेंगे जिन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया है। वे चाहे श्रीराम हों या कृष्ण हों महावीर हों गौतम बुध्द हों गोखले हों या महात्मा गांधी जी हों ।ये समाज में पैदा हुए और युगों युगों तक अमर भी रहेंगे । जीवन का स्फूर्ति मय अभिनन्दन तो देश के लिए जीवन के प्रतिदान में ही है। इसलिए इस पर विचार कीजिए कि केवल केक काटने से आप देश -समाज के हृदय में पैदा नहीं होंगे । राष्ट्र चेतना से तन मन चेतना को आत्मा को स्पन्दित कीजिए और समाज में पैदा होइये ।यही दशा समुचित है ।
विनीता रघुवंशी
