Home आंगन बुहारते वक़्तप्रहरी-आंगन बुहारते वक्त

प्रहरी-आंगन बुहारते वक्त

by Dr. Vinita Raghuvanshi
प्रहरी
*****
तुम यदि देश की सत्ता हो
तो प्रहरी हूं मैं
तुम्हारे वास्ते भी —
और अवाम के लिए भी
क्योंकि मेरे अंदर का सूरज
कभी डूबता नहीं
और मौसम चाहे जो हो
मेरा जमीर कभी सूखता नहीं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में जमीर ,अखलाक ,आत्म परिचय की ताकत को व्यक्त करती कविता है ।आदमी के अंदर यदि जमीर जिन्दा है ,ईमान कायम है ।तो उससे ईश्वर भी रुठ नहीं सकता ।उसके आसपास एक सघन घेरा होता है जो कवच का काम करता है ।उसकी आत्म गंध ही उसका आत्म परिचय और पहचान होती है ।आदमी के चारों ओर सत्ता का घेरा घूमता है और सत्ता हमेशा अन्याय और साजिश के बीच अपना रचाव करती है ।उसके पास सच और झूठ के बहुत से उजले ,काले ,स्याह सफेद कारनामे होते हैं जिन पर वह टिकी होती है ।सत्ता का यह स्वरुप आदमी के पास कई रुपों में होता है जैसे –धर्म सत्ता ,अर्थ सत्ता ,परिवार सत्ता समाज सत्ता ,जाति सत्ता ,कुल-खानदान सत्ता , व्यापार -रोजगार सत्ता , वर्ग सत्ता ,वर्ण सत्ता , इन सब से ऊपर राज सत्ता ।जहां भी प्रबंध व्यवस्था का अनुशासन है ।नियम और विधान है ,विधि है वह सब सत्ता के अन्तर्गत है । मनुष्य अपने आस पास सत्ता से घिरा होता है । लेकिन जकड़न केवल राज सत्ता की ही महसूस होती है ।क्योंकि राज सत्ता के द्वारा स्थापित विधि- व्यवस्था , संविधान पर स्थापित होती है जहां आदमी स्वतंत्र होते हुए भी नियमों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध होता है । संविधान के दायरे में बंधी अवाम हर हमेशा जनतंत्र की सच्ची प्रहरी होती है । संविधान ही पालन और दण्ड का विधान रचता है यह आम नागरिक पर ही निर्भर होता है कि वह अपने देश के संविधान ,नियमों का ,कानूनों का कितना पालन करता है उनके अनुसार अपने आचरण को स्थिर करता है ।नियम पूर्ण आचरण ही संविधान का सम्मान है ।यही बताता है कि यदि हम देश के प्रति ईमानदार और नैतिक रुप से संप्रभुता के रक्षक हैं तो संविधान के अनुसार राज सत्ता की सभी कार्यवाही संचालित होगी ।मुनाफे और लाभ पाने के लिए देश की संस्थानिक सत्ताओं के स्वरुप को छिन्न -भिन्न नहीं किया जायेगा ।शिक्षा भी एक सत्ता है जो मनुष्यों में चेतना का बीजारोपण करती है ।किन्तु जब राज सत्ता लोक कल्याण कारी रुप बदल कर स्वार्थी और निरंकुश होने लगती है तब जनता के भीतर बसा जमीर ,अखलाक ,सच्चाई ,ईमान ही वह शक्ति है जो राज सत्ता ,धर्म सत्ता पर अंकुश लगाने का काम करती है ।जनतंत्र में जनता का आचरण जमीर और अखलाक अर्थात आत्म परिचय पर स्थिर रहना चाहिए ।जनता कभी भी कुल -टोटल भ्रष्ट नहीं होती ।वह संविधान का महत्व जानती है लेकिन उसकी निष्क्रिय चेतना के चलते राज सत्ता अपने को निरंकुश और जन विरोधी बनाने में सफल हो जाती है ।दण्ड भय भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाता है ।मनुष्य के आसपास सभी सत्ता के प्रकार और प्रणालियां यदि किसी एक सत्ता के स्वरुप से प्रभावित होती है तो वह है राजनीतिक सत्ता ।मनुष्य चाहे राजनीति में सक्रिय हो या ना हो पर यदि वह किसी देश के भू-भाग में बसा वहां की आबादी का हिस्सा है तो उस पर वहां की राज सत्ता का नियंत्रण अवश्य होगा । इसलिए चाहते हुए या ना चाहते हुए भी आदमी का राजनैतिक वजूद अवश्य जुड़ा होता है ।आदमी की आर्थिक ,धार्मिक , कारोबारी,रोजगार ,सब राजनीति के संवैधानिक स्वरुप पर आश्रित है । सत्ता जितनी ही संविधान आधारित आचरण पर टिकी रहेगी जनता का जीवन सुखद और शान्ति अमन और अहिंसा से परिपूर्ण रहेगा । लेकिन यदि सत्ता स्वयं भ्रष्ट आचरण की पोषक होगी ,स्वार्थ और लाभ -लोभ की राजनीति का संचालन करने में आमादा होगी उस समय जन सामान्य का जमीर ही वह ताकत है जो भ्रष्ट राजसत्ता पर अंकुश और नकेल लगाने में कामयाब होगी ।यह तो जनता की चेतना ,जमीर ,अखलाक,सच्चाई ,ईमान का सदा सक्रिय आत्म परिचय ही दृढ़ इच्छाशक्ति से राष्ट्र की चौकसी और पहरेदारी कर सकेगी ।पहले जनतंत्र में आदमी को अपने जमीर का आत्म परिचय हो तब उसे अपनी निष्क्रिय चेतना का बोध होगा ।यह बोध ही उसे सचेत करेगा और धर्म सत्ता के सही रुप ,अर्थ सत्ता के विकृत रुप ,और राज सत्ता के भ्रष्ट आचरण की बजाय जन अनुकूल लोक कल्याण के सर्व हितकारी सत्ता स्वरुप को प्रतिष्ठित करेगी ।जनता का जमीर ही वह बीच की कड़ी है जो संविधान और सत्ता के बीच तालमेल बैठाती है ।जागरुक जन ही सच्चा प्रहरी है । सच्चाई और जमीर कभी किसी का पक्षधर नहीं होता वह जन हितकारी होता है । वह सदा न्याय के साथ होता है । वह जन ज्यादा कारगर होता है जिसका ईमान और जमीर सूखा नहीं है ।जिसमें करुणा की आद्रता और नमी बनी हुई है । 🙏विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More