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निर्भिकता-आंगन बुहारते वक्त

by Dr. Vinita Raghuvanshi
निर्भिकता
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वह निर्भिकता के साथ
भय की खोज में निकला
तो लोगों ने रोका
और गले में ताबीज बांधकर
टोने -टोटके पकड़ा दिये हाथों में उसके
अब निर्भिकता
किसी और का साथ खोजने
कंटीले मार्ग पर निकल पड़ी है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में आदमी के भीतर जमे भावों पर किस तरह समाज अपनी धारणाओं का अपने विश्वासों का प्रभाव डालता है । इसी के असर पर चर्चा की है ।आदमी को शिक्षा ही वह मूल मंत्र है जो विचार करने की शक्ति देती है ।जो निर्भय बनाती है । लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में आज पढ़ा लिखा व्यक्ति ही सबसे ज्यादा भयभीत हैं ।निर्भय होना एक गंभीर भाव है ।जो मनोवैज्ञानिक है ।यह मन का भाव है ।निर्भयता की दो परिस्थिति होती है एक सब कुछ खोने का डर और दूसरा सब कुछ बचाने की फ़िक्र ।आदमी इन दोनों स्थितियों से उबरने के लिए वैचारिक मनोबल तैयार करता है और अपनी वंचित स्थिति को सामने रखकर सोचता है कि यदि निर्भय होकर संघर्ष कर लिया जाये तो पाया नहीं तो खोना कुछ नहीं है ।यह आदमी की वैचारिक यात्रा है ।आदमी को जब भय के मूल को खोजने की यात्रा करनी पड़ी तो लोग उसके निर्भय होने के भाव को ही सबसे पहले संरक्षित और सुरक्षित करने लगे ।वे उस निर्भीक आदमी की फ़िक्र के लिए भयभीत हो गये ।भय अमूर्त है लेकिन हम चिन्ता ,फिक्र ,सतर्कता ,सचेत होकर उन्हीं उपायों को आजमाते हैं जिनसे भय,डर की पुष्टी होती है ।भयहीन मनुष्य की चिन्ता और रक्षा की जिम्मेदारी उन्हीं भय के सूत्र बने गण्डे ताबीज टोने -टोटके के हवाले करके निश्चित हो जाते हैं ।निर्भय होने के लिए हम फिर भय की शरण में पहुंच जाते हैं ।यह मनुष्य की भावनात्मक विडम्बना ही है ।निर्भीकता को बचाने के लिए हम भय को ही अपना सहारा बनाते हैं ।जब की निर्भयता की रक्षा के लिए हमको खुद को निर्भय बनाकर साथ में खड़ा होना चाहिए लेकिन लोकमानस निर्भीक आदमी को बचाने के भय में डूब जाता है ।उसकी चिंतन प्रक्रिया पूरी तरह भय के मनोविज्ञान पर टिक जाती है ।वह भी निर्भयता को बचाने के लिए चिंतित और भयभीत हो जाता है । लोकमानस का यह भयभीत होना ही विपरीत स्थिति है जबकि उसकी सीधी दशा और दिशा तो निर्भीकता के संग साथ की होना चाहिए ।जंब भय की खोज में निर्भीकता निकल पड़ी है तो जन समाज को भी भयमुक्त होकर निर्भीकता के पक्ष में तनकर रहना चाहिए । लेकिन जन समाज का मनोविज्ञान उस समय सही स्थिति का चयन नहीं कर पाता है और वह स्वयं निर्भय होने की बजाए निर्भीकता को बचाने के ढोंग करने लगता है ।यह खुद से खुद को अलहदा करने की साज़िश है ।अपने आपसे किया गया छल ही है। जहां भयहीन अवस्था को समझें बिना भयभीत होने की दिशा में बढ़ने जैसे हालात ही हैं ।निर्भयता एक चेतना है और भय एक अचेतन स्थिति है ।अचेत से सचेत होना ही तो निर्भीकता है ।शिक्षा ,अनुभव , अनुभूति ही वह माध्यम है जो मनुष्य की भय पूर्ण जड़ता को खतम करती है ।पर आदमी इन तीनों से कोई रास्ता नहीं खोजता वरन इन तीनों रास्तों को भी अपने भय की जड़ता से बन्द कर देता है ।आदमी को यदि भय से सही ढंग से मुक्त होना है तो उसे अपने अनुभव का इस्तेमाल करना चाहिए या विचार का सहारा लेना चाहिए या फिर शिक्षा को इसके लिए हथियार की तरह प्रयुक्त करना चाहिए । निर्भीकता को भय के टोने टोटके से तो दूर रखना ही होगा ।अपने वजूद के लिए ,अपनी चेतना के लिए , अपने समाज के लिए ,अपने देश के सवालों के लिए ,अपने आत्म सम्मान के लिए , मानवीय करुणा के लिए निर्भीक होना सबसे सही और कंटीला रास्ता है जिस पर बढ़ना जोखिम भरा है ।पर निर्भीकता वहीं सबसे सुरक्षित है ।खतरे तो निर्भय अवस्था से जुड़े ही हैं ।
🙏विनीता रघुवंशी

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