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आंगन बुहारते वक़्त

सिरे तक ******* प्यार उस खरगोश की तरह है जो एक सिरे से बिल बनाता दूसरे सिरे तक निकल जाता जहां उसी का इंतजार करती घृणा हर बार खड़ी मिलती …

हँसी के आँसू *********** हँसी के आँसू देखे हैं ? वे रुदन के आँसुओं जैसे नहीं होते ना उतने गरम ना उतने तरल ना ही समाया रहता सागर भर नमक …

प्रेमशंकर रघुवंशी जी के जन्मदिवस पर एक विशेष कविता पुण्य स्मरण के साथ समर्पित उम्र के वृक्ष पर ************* भरपूर जीकर उम्र के वृक्ष पर निशान छोड़ झरने ही वाला …

खोज ***** खोज रहा गालियों में छिपी प्यार की भाषा भटक रहा हिंसक इरादों में समाई अहिंसा की छांव पाने और तलाश रहा उस आग को जो बुझे चूल्हे चेताना …

स्मृति में खोज ************ वर्तमान के पास नहीं होता काम -धाम कांटे नहीं कटता वक्त तब वह —- गड़े इतिहास को घसीटकर बाहर लाने का काम शुरु कर देता और …

मूलमंत्र ******* अच्छा किया वोट देने का अधिकार दिया किन्तु यह तो बताओ लोकतंत्र को समझकर समझाने का मूलमंत्र कब दोगे ? ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह …

अक्सर यह कहता है अनूप ********************** अक्सर यह कहता है अनूप कि बिना कीमत कुछ भी नहीं देता ग्राहकों को वह और मैं हूं कि देता रहता मुफ्त बिना कीमत …

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