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हँसी के आँसू
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हँसी के आँसू
देखे हैं ?
वे रुदन के आँसुओं जैसे
नहीं होते
ना उतने गरम
ना उतने तरल
ना ही समाया रहता
सागर भर नमक उनमें ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में अनुभूति की गहराई का अनुभव संजोया गया है। प्रसन्नता में, आनंद में, खुशी में, अतिरेक में निकले आँसू में वह मन की दशा नहीं होती ।वे क्षणिक आनंद की तरलता से उपजे होते हैं। खुशी और व्यथा के बीच बहुत अन्तर होता है। हँसी के आँसुओं में मन की गुदगुदाहट होती है। मन का मजा होता है। आत्मा की सहज अनुभूति होती है जो अवसाद हीन मन से महसूस की जा सकती है इस तरह की हँसी के आँसुओं को समझना और अवसाद से व्यथित मन से निकले आँसुओं में पीड़ा होती है। वेदना होती है। वो कष्ट और संकट का अनुभव भी समाया होता है जिसमें विलाप है। सतत विलाप मन कही रुकना ही नहीं चाहता। कष्टदायक सिसकियाँ समाई हैं। रुदन की गंभीरता बिना विचारे ही आँसुओं में बहती रहती है । आत्मा व्यथित। है, वेदना का अनुभव कर रही है। आसन्न संकट महसूस किया जा रहा है और उपाय की दिशा धूमिल है? ऐसी अवस्था में जब रुदन बन कर आँसू बहते हैं तो वे व्यथा की उष्मा से बनी भाप से गरम होते हैं उसमें हँसी की शीतलता का लेश भाव भी नहीं होता वे आनंद की उत्पत्ति नहीं वेदना की भूमि से उतरते हैं। जहाँ मन का अभाव कष्ट सक्रिय होता है। रुदन मन की पीड़ा की एक स्थिति और दशा है जो हँसी के माहौल से बिलकुल अलग है। पीडा के आँसुओं में मन, प्राण, आत्मा की द्रवीभूत अवस्था समाई होती है जो वेदना के नमक से भरे होते हैं वे हँसी के आँसुओं जैसे स्वाद हीन और ठोस नहीं होते ।लेकिन वेदना की अनुभूति से बहते आँसुओं में खारेपन का स्वाद होता है। वे निरंतर तरल गति से गालों पर रिसते रहते हैं। यदि मनुष्य सचमुच मनुष्यता। के भाव, संवेदना और करुणा का बोध रखता है तो वह वेदना और अवसाद में बहते आँसुओं और हँसी में आँख की कोर के भींग जाने का मतलब अच्छे से जानता है। मनुष्य के अवसाद, दुख ,पीड़ा ,कष्ट,व्यथा ,वेदना की अनुभूति और अनुभव में निकलते आँसू ही मन की खरी और सच्ची पहचान होती है। ये आँसू ही मनुष्य की संवेदनशीलता, करुणा , और द्रवणशील चेतना के परिचायक होते हैं। “करुणाकर करुणा कर रोये ” यह है ईश्वर की मनोदशा ,मनुष्य की चेतन अवस्था भी इ
