4
विनीता रघुवंशी
सिरे तक
*******
प्यार
उस खरगोश की
तरह है
जो
एक सिरे से
बिल बनाता
दूसरे सिरे तक
निकल जाता
जहां
उसी का इंतजार करती घृणा
हर बार खड़ी मिलती उसे
और वह हर बार
कूदकर फलांग जाता
झट्ट से ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में प्रेम की आत्मा अनुभूति की उस तत्व की परख करने की चेष्टा की गयी है जिसका अनुभव मनुष्य को बहुत लम्बे समय तक महसूस ही नहीं होता ।वह हर पल प्यार की अनुभूति से अनजान और बेखबर रहता है । मनुष्य का हृदय ही तो है जो बिल की तरह है और उसके हृदय में स्पन्दन खरगोश की तरह ही है ।प्यार मानव मन की वह अनुभूति है जिसके लिए आदमी प्रयत्न शील तो रहता है लेकिन वह यह नहीं जानता है कि किसी की चिन्ता करना ,किसी के सुख -दुख का ख्याल रखना ,मन को पीड़ा ना पहुंचाना , मनोनुकूल कार्य और सम्मति रखना , ये सब ही तो प्यार की परिभाषा में शामिल होता है ।हर मनुष्य खरगोश की तरह प्यार को हासिल करने के लिए प्राणपण से प्रयास करता है लेकिन यह सांसारिक प्रवृत्ति ही है कि प्यार ,लगाव,प्रेम के बदले में घृणा का ही सामना करना होता है । समाज की यह बेहद दुविधाजनक स्थिति है कि मनुष्य मनुष्य से प्रेम के साथ परस्पर पेश नहीं आता बल्कि मनुष्य लोक प्रभूत व्यवहार में सहज प्रेम की दशा को स्वीकार नहीं करते वरन वे यह विचार करते हैं कि किसी मनुष्य को क्या जरुरत जो वह बिना मतलब के किसी से प्यार करें ।यहां तक की प्यार को जाति ,धर्म, कुल गोत्र आदि से जोड़कर भी देखते हैं ।जो विधर्मी है ,जो हमारी जाति या कुल का नहीं वह हमसे क्यों प्यार करने लगा? यह सवाल कितना बेमानी है । हर मनुष्य हर आदमी जो आदमी के मिजाज में आदमी है उसके लिए कोई मतलब न होने के बावजूद भी मनुष्य मनुष्य से प्यार प्रेम कर सकता है लेकिन सामाजिक व्यवहार में प्यार और लगाव के होने के पीछे भी वजह ढूंढी जाती है और तब प्यार को घृणा का सामना करना पड़ता है ।घृणा की वजहें बहुत कमजोर होती है और वे प्यार का रास्ता नहीं रोक पाती इसीलिए प्यार रुपी खरगोश उस घृणा की परवाह किये बिना प्यार को हासिल करने के लिए फलांग जाता है ।कविता में खरगोश प्यार का रुपक है ।घृणा कभी भी मनुष्य के मन को निर्विकार नहीं बनाती और प्यार हमेशा आदमी को निर्विकार बनाता है । मनुष्य के मन का प्रक्षालन करता है । मनोविकार और मनोविकृतियां घृणा में होती है समस्या भी घृणा और नफरत से उत्पन्न होती है प्यार से सभी अवरोध समतल और निष्फिक्र जीवन का सार बन जाता है ।प्यार आदमी का आदमी पर अटूट भरोसे का प्रमाण है और नफरत,घृणा मनुष्य के आत्म विश्वास की कमजोरी ? प्यार और लगाव अटूट सिलसिला है सिरे सिरे तक सुरक्षा का , संरक्षण का ,अहिंसा का आधार भी है । आदमी जन्म से लेकर मृत्यु तक यदि सामाजिक जीवन में प्यार का ही इस्तेमाल करें तो फिर उसके जीवन में सहज स्वीकृति के समतल ही रहेंगे ।घृणा की दहशत ,तनाव,भय खौफ नहीं पैदा होगा । क्या यह आदमी के जीवन में सबसे आसान काम नहीं है? यह विचारणीय प्रश्न है । खरगोश एक कोमल प्राणी है इसीलिए वह प्यार का प्रतीक बनकर कविता में प्रयुक्त हुआ ।प्यार भी अपनी प्रकृति में बेहद कोमल और नाजुक ,सूक्ष्म अनुभूति है जो अनुकूल स्थितियां पाकर पनपता है और प्रतिकूल दशा में निष्प्राण हो जाता है ।
हमेशा प्यार को अनुकूल दशा मिले ऐसी ही समाज संरचना बने आदमी आदमी से परस्पर प्रेम कर सके ,भरोसा आदमी की प्रकृति और स्वभाव का हिस्सा बना रहे ।घृणा का संशय भी कभी उत्पन्न न हो ।
