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विनीता रघुवंशी
लोकतंत्र के आकाश पर
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यह सच है कि लोकतंत्र में
लोक को चाहे जितना सताओ
नहीं बना सकते गुलाम उसे
ना ही कर सकते
तानाशाहों की तरह वहां कुछ भी
यह भी कि आकाश पर
मेघों के झुण्ड चाहे जितने हों
और वे चाहे जितने चिंघाड़ें सर्वत्र
लेकिन महावत तो जमीन पर ही रहें हैं लोकतंत्र में
और हां ! देशभक्ति कोरा नारा नहीं है यहां
कि नहीं लगाओ तो राष्ट्रद्रोही कहाओ
वह तो ,गरीबों ,पीड़ितों , अल्पसंख्यकों,अल्पज्ञों के लिए
भरोसे की वह कामधेनु है
जो श्रमसागर के मंथन से ही प्रकट होती है
और बिना मांगें जन -जन को देती है सबको समान
हर वक्त जागते रहो की रम्हांट के साथ ।
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में लोकतंत्र में जनता के महत्व को समझाने की कोशिश की गई है ।जनतंत्र में आम जन का महत्व बहुत है ।यदि जनतंत्र कहीं सुरक्षित है तो वह समाज के सबसे वंचित और उच्छिष्ट समझे जाने वाले वर्ग के पास ही रक्षित है ।उसके पास न तो देशभक्ति का ढोंग है ना ही वह नारों के बीच से झांक कर राष्ट्र को ही देखता है ।वह देश की मौलिक और भौतिक परिभाषाओं से बिल्कुल अनजान होता है लेकिन जमीनी हकीकत में वही राष्ट का सच्चा अर्थ भी समझता है क्योंकि वह पैर के नीचे जमीन की पुख्तगी और सर ढंकने के लिए झोंपड़ी भर छत को सबसे बड़ी जरुरत के रुप में महसूस करता है । इसीलिए वह जानता है लोकतंत्र की खुली और ताजा हवा के झोंके को ।वह वाकिफ है जनतंत्र की सच्ची गर्माहट और सुखद ताकत से ।जनतंत्र में सत्ता चाहे जितने कष्ट दे ,वेदना और उपेक्षा सहन करायें लेकिन अपनी अभिव्यक्ति ,न्याय पाने की अवस्था , सामाजिक समानता , फर्श से अर्श तक पहुंच जाने की स्वायत्तता को बखूबी जानती है ।जनतंत्र की रक्षक है यह अल्पज्ञ ,वंचित, अल्पसंख्यक ,गरीब और पीड़ित जन समुदाय जिसका लोकतंत्र सहारा है ।यह जन समुदाय जानता है कि यदि तंत्र में सख्ती और अधिनायक तंत्र के लक्षण उभरते हैं तो वह स्थिति जन सामान्य के लिए लाभ दायक नहीं है ।सबसे ज्यादा अतिचार यदि किन्हीं पर होगा तो वह कमजोर अवाम पर ही होगा ।वहीं तंत्र की यातनाओं का शिकार होगी और धनाढ्य व्यक्ति तो सभी तरीके से सम्पन्न है वह यातना से बचने के लिए वतन बदल सकता है ,व्यवसाय बदल सकता है ,रिश्वत से तंत्र को अपने काबू में कर सकता है लेकिन राष्ट के लिए सच्ची निष्ठा और भक्ति यदि कहीं हिलोरें ले रही है तो वह इसी जमीन से जुड़े वर्ग के भीतर ही महसूस की जा सकती है ।इस श्रमजीवी वर्ग के भीतर राष्ट वाद का पाखण्ड नहीं है इनके पास देश पर न्यौछावर होने की उत्कट समर्पित भावना होती है । यहां देशभक्ति के कोरे नारों का जयघोष करके अपनी निष्ठा का झूठा प्रदर्शन नहीं किया जाता । वर्तमान स्थितियों में भ्रष्ट राजनीति और भटके हुए नेतृत्व के हालात यह है कि ‘भारत माता ‘की जय ना बोलने वाला देशद्रोही और”जय श्री राम ‘ का उद्घोष न करने वाला हिन्दुत्व से बेदखल और खारिज किया जा रहा है ।भले वह जनेऊ धारी और आस्थावान ही क्यों न हो ? आज मनुष्य के देशभक्ति के प्रमाण पत्र और मान दण्ड बदल गये हैं ।जरा -जरा सी बातों के लिए जन सामान्य को भयभीत किया जा रहा है अभिव्यक्ति की आजादी को नियंत्रित किया जा रहा हो और बिना अपराध के आम आदमी को सलाखों के पीछे धकेला जा रहा हो ,बोझिल न्याय प्रक्रिया में उलझाया जा रहा हो या बेवजह सख्ती का सामना भले करना पड़ रहा हो पर फिर भी लोकतंत्र की खुली हवा को तानाशाही अपने अंधकार में समेट नहीं पायेगी क्योंकि जनतंत्र के रक्षक और पालक गरीब ,वंचित ,अल्पज्ञ वर्ग के सामान्य जन है ।लोकतंत्र रक्षित है इसी तरह के पाखंड शून्य आम आदमी के हाथों में ।धनाढ्य और शिक्षित वर्ग अपनी निष्ठा में परिवर्तन करता रहता है लेकिन अल्पज्ञ और श्रमजीवी वर्ग अपनी वैचारिक अवस्था ,विवेक -बोध, राष्ट्रीयता के प्रति दृढ़ और कर्मठ सत्ता का पक्षधर होता है । उसकी निष्ठा आस्था कर्म प्रधान होती है और राष्ट्र भावना यथावत रहती है ।’कोऊ नृप हो हमें का हानि ‘ का भाव सदा संचालित रहता है ।जब तक यह खरी निष्ठा से जुड़ा जन समुदाय है तब तक जनतंत्र को कोई भी हानि नहीं पहुंचा सकता ।ना तानाशाही ना अधिनायक वाद के भयभीत करते लौह कपाट और सींखचे ।
