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पहाड़ो के बीच
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पहाड़ों की चोटियों तक
देह पर अजगर कसे मत दौड़ों
किसी गोल पत्थर की तरह
लुड़कते चले जाओगे
पहाड़ी यात्रा की तैयारी के पहले
मोमबत्ती की तरह पिघलकर मत जमो
मुट्ठी में दबे हीरे जैसा
अपने अस्तित्व का खिसक जाना अथवा
देहरी का दिया बुझा कर
अंधेरे कमरे में टहलना
महज टूटन और ऊब के
कुछ भी नहीं देता
इन पहाड़ों बीच के
फूलों की तरह खिलो
झरनों की तरह जियो
बहते रहो लगातार नदी की तरह
पहाड़ों के बीच ! !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में मनुष्य जीवन के साथ जुड़े खतरे और जोखिम भरे हैं ।आदमी ऊंचाई और शिखरों को छूने की तमन्ना लिए पहाड़ों को चढ़ रहा है ।यह ऊंचाई और शिखर छूने की इच्छा ही एक तनाव एक कसावट से भरी है ।कमर पर रस्सियों के कसाव को अजगर की उपमा दी गयी है ।यह कविता में नया प्रतीक बनकर प्रयोग हुआ है। अजगर कसना याने शिखर को छूने की इच्छा में ही जोखिम और संघर्ष है ।आदमी की अंधाधुंध इच्छाएं ही उसकी चेतना का तनाव है ।यही तो स्थिति है जो अजगर कसने जैसी प्रक्रिया में दिन-रात आदमी को डाल रहा है । ऊंचाई खुद एक खतरा है । जहां हर समय एक संघर्ष बना होगा ।एक अनजानी प्रतिस्पर्धा बनी रहेगी ।यह प्रतियोगिता और स्पर्धा अजनबी के साथ होगी और हर बार शिकस्त और हार का भय बना रहेगा ।शिखर और ऊंचाई से हर बार लुढ़कना ही तय है ।क्योंकि प्रतिस्पर्धा अनवरत है ? अब कविता में सचेत किया जाता है कि यदि सचमुच ऊंचाई की ,पहाड़ी की यात्रा करने की इच्छा। बलवती है तो फिर अपने भावोद्रेक को संयमित रखो हर सत्ता प्रमुख और शीर्ष सत्ता के सामने अपनी रीढ़ को मत झुकाओ ।दयाद्र होकर विनय मत करो ।हर सत्ताधीश के सामने अपनी करुणामय छवि का प्रदर्शन मत करो ।शीर्ष तक पहुंच ने के प्रयास खुद ही करना होंगे ।अपनी क्षमता अपनी काबिलियत , अपने हुनर से खुद ही वाकिफ होना होगा और अपने भरोसे को खुद ही मजबूत करना होगा वरना मुट्ठी में दबे हीरे की तरह खुद ही खुद के अस्तित्व का खिसक जाना महसूस करोगे ।ये सबक है हर उस व्यक्ति के लिए जो शीर्ष पर ,शिखर पर ,ऊंचाई पर पहुंचना चाहता है ।या केवल समस्या और कठिनाई का अन्दाज करके अंधेरे बन्द कमरे में चिन्ताग्रस्त होकर तनाव लिए टहलना ये कारगर उपाय नहीं है ? इससे महज व्यक्तित्व में टूटन होगी ।जीवन में केवल ऊब होगी ।यह गुस्सा ।यह तनाव ।यह आक्रोश ।यह चिन्ता ।यह फिक्र।सिर्फ निरर्थक और निष्प्रभावी होगी ।यह टहलना केवल अपने आप को खोने जैसा है । इसीलिए इसका समाधान है पहाड़ की चट्टानों के बीच उगे पौधे के फूल बनकर खिलो ।झरनों की तरह हरहराते जियो और नदी के समान हर समय गतिशील रहो जीवन के विकट- संकट, उतार -चढ़ाव ,झेलते सदा प्रवहमान रहना ही जीवन का सच है ।सचमुच जीवन तो विकट समस्याओं से भरा है ।तनाव की स्याही आदमी के आनंद की चमक छीन लेती है ।यदि वास्तव में जीवन के संघर्ष ,तनाव ,उदासियां से मुक्त होना है तो चिन्ता या फिक्र करने से कुछ नहीं होगा उसके समाधान ,हल,या निदान करने से ही फूलों की खिलखिलाहट और झरने सी उन्मुक्तता आ पायेगी ।यही पहाड़ों के बीच खिले जीवन की उत्फुल्लता है ।शिखर मिले ना मिले प्रवाह जरुर बना रहे ।
विनीता रघुवंशी
