Home आज की कवितापत्थरों के बारे में सोचते हुए-पहाड़ों के बीच

पत्थरों के बारे में सोचते हुए-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
पत्थरों के बारे में सोचते हुए
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पत्थरों की आंखें इतनी नम क्यों है ?
क्यों फूटते हैं सन्नाटों के गीत
इनकी आहों से ?
दोपहरें इनके शरीर को काला क्यों कर जाती हैं ?
रात में खड़े -खड़े ये
क्यों पीते रहते दर्द ?
कब तक बने रहेंगे कठोर ये अपने लिए यों ही ?
मौसम के तरफदार पत्थरों से
यही सब यही सब पूछना है
मुझको एक दिन ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में जो तकलीफ सहते सहते पथरा गये हैं । सवाल उनके दर्द के भीतर से उठ खड़ा हुआ है ।हर बार कष्ट झेलती आत्मा पत्थर सी सख्त हो जाती है ।आदमी का यह कठोर और पथराया स्वरुप ही रचना में सवाल बनकर आया है ।पठार में रहता आदमी हो या पहाड़ में बसा हुआ आदमी हो या सघन जंगल में जीवन गुजारता आदमी हो ।उसकी जिन्दगी में जीवन को बचाते रखने की जद्दोजहद होती है ।न्यूनतम जीवन स्थितियों के बीच से समझौता करना पड़ता है ।एक ओर धन की इफरादी में डूबा पूंजीपति ,धनाढ्य वर्ग है तो दूसरा धन की तंगी में गरीबी में अपनी न्यूनतम जरुरतों के लिए संघर्ष करता जन है ।सवाल इस गैर बराबरी और असमानता के भीतर से ही उठ खड़े हुए हैं ।कविता में पत्थर को प्रतीक के रुप में प्रयोग किया गया है ।यह पत्थर याने आदमी दर्द ,तकलीफ़ ,पीड़ा भोगते भोगते पत्थर बन गया है ।जिसकी जीवन दशा में आहें हैं ,आंसू हैं ,और सन्नाटों से भरपूर संगीत है ।जीवन का उत्साह नहीं ,उमंग नहीं केवल श्रम है हाड़ तोड़ मेहनत है ।यही है जिन्दगी में समाई भौतिकता ,सुख -सुविधा और आराम -विश्राम यह है जीवन -राग ।जहां रात आती है पर निद्रा के लिए नहीं वरन दर्द पीने के लिए ,मन में दबाए रखने के लिए ।यह घनघोर यातना सहता मनुष्य ही वह पथराया हुआ पत्थर है ।जो उजाड़ बंजर धरती को चीर कर अपने जीवन को रक्षित कर रहा है आदमी की यह कठोरता अपने आप के लिए कब तक यों ही निरंतर बनी रहेगी ।कभी न कभी तो उसे अपनी दशा सुधारने के लिए आवाज उठानी ही होगी ।एक न एक दिन तो पूंजी से बनते बिगड़ते मौसम की तरफदारी करती सत्ता को जवाब देना ही होगा ।एक दिन चेतना से संपन्न वैचारिक समाज को यह सवाल धनाढ्य होती सत्ता से पूछना ही होगा ।यह वैचारिक परिवर्तन की कविता है जिसमें गरीब और पूंजीपति ,शोषक और शोषित के बीच बंटें समाज के करवट का प्रश्न है ।जिसे समाज को मिलजुलकर हल करना है ।कोरे सवाल बदलाव नहीं ला पाते ।बदलाव के लिए समाज का वैचारिक धरातल बदलना होगा तब ही समाज से गैर बराबरी और असमानता मिटेगी पर जब यह सवाल हरेक को चिन्तित और इसी तरह विवेक को मथेगा तब ही यह हल निकलेगा ।तब ही यह चेतना के जागरण का हिस्सा होगा अन्यथा समाज हर दशा में शोषक और शोषित के बीच सांस लेता रहेगा ।पत्थर बने मनुष्य के हालात यों ही सुबह दोपहर रात के भीतर सिसकते आंसू ,दर्द और आहों के सन्नाटे गूंजते रहेंगे ।कविता की संवेदनशीलता का मर्म करुणा से भरा है । 🙏विनीता रघुवंशी

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