पहाड़ से बातचीत *************** पहाड़ ! तुझे पर क्या टूट पड़ा है कि तेरी चट्टानें पहले से ज्यादा भयावह लगने लगी हैं इनके इर्द गिर्द और ऊपर संतरियों —– से …
पहाड़ों के बीच
तब तक ******* जब भी चलता हूं लगता है मेरे कदम किसी क्रान्ति उत्सव में शामिल होने के लिए बढ़ रहे हैं किन्तु तब तक आॅफिस आ जाता है वहां …
वजह ***** बदलते हुए लोगों के बीच तू आज तक नहीं बदली तेरी आत्मा ने कोई चोला नहीं बदला वह संधों के बीच फंसकर रह गई क्या ? चलना सीखने …
पिता ***** चाहे जितना सर्द गर्म हो मौसम पिता भोर के पहले उठ आते नहा धोकर रोज रोज नहलाते घाटी से उगते सूरज को — चमचमाते कलश से मुझे पिता …
ठीक पहचान के लिए ****************** पानी जब सदियों से ठण्डा पड़ा हो तो – – – उसे खौलाना जरुरी हो जाता है वह बादल ,बिजली, आकाश से गुजरकर खुद को …
सैलानियों के लिए *************** पहाड़ की शक्ल में सिवान तक आ पहुंचा है तानाशाह उसकी भौंहों पर झुके हैं बादल पलकों पर खेल रही शबनम कलाइयों पर लिपटी है नदियां …
अनुभव ****** तुमने कभी पहाड़ को छेड़कर देखा है वह प्रलय के बादलों जैसा गड़गड़ाता है चट्टानों को झकझोरा है वे शेरनी की तरह गुर्राती है पत्थरों से बोले हो …
सुप्रभात नूतन वर्षाभिनंदन संकल्प —-१ एक लपलपाता खंजर मेरे माथे पर लटका है जहां भी नजरें दौड़ाता हूं वहां अपने उन्नत – अनंत माथे पर झूलते खंजर ही खंजर दिखाई …
