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विनीता रघुवंशी
तब तक
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जब भी चलता हूं
लगता है मेरे कदम
किसी क्रान्ति उत्सव में शामिल होने के लिए बढ़ रहे हैं
किन्तु तब तक आॅफिस आ जाता है
वहां से लौटते हुए तय करता हूं
कि समाज की टूटन को
जोड़कर ही दम लूंगा
घर आकर खुद ही
रेत – सा बिखर जाता हूं टूटकर ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में आदमी के आसपास के खस्ताहाल हालात के बीच कमजोर होते आदमी के हौंसले का टूटना रेखांकित किया गया है ।घर से आफिस की दूरियां पाटते हुए आदमी के भीतर एक उत्साह ,एक उमंग, एक जोश और ताजगी होती है ।वह मन ही मन विचार करता है कि वह यथास्थिति में बदलाव लायेगा । समाज के वैचारिक ढांचें को बदलने की कोशिश करेगा । समाज के भीतर बढ़ती हिंसा , अन्याय ,गैर बराबरी ,सब को मिटाना चाहिए । समाज जिन हालातों से गुजर रहा है ।गरीबी ,भूखमरी , उच्छृंखलता , मर्यादा हीनता बर्बरता , अज्ञान, अशिक्षा , के हालातों से बेखबर है उन से निजात दिलाने के लिए आदमी को अपने आपको खड़ा करना चाहिए ,जागृति लाने की जरुरत है । समाज में रहते हुए आदमी के मन में बहुत सारे मंसूबे विचार बन कर उथल- पुथल मचाते हैं ।वह दिन भर आफिस की चारदीवारी में निर्जीव फाईल और दम घोंटू माहौल के बीच सांसें लेता है और उसका सारा उत्साह घर तक आते आते ठण्डा हो जाता है । यह है चेतना की मायूसी ।जब चारों ओर एक नीरस और ऊबाऊ यथास्थिति भरा यथार्थ चक्कर मार रहा हो तब ऐसे वातावरण में एक अकेले व्यक्ति के बदलाव के मंसूबे तो बिखर ही जायेंगे ? जब तक यथास्थिति का नीरस ,ऊबाऊ ,और अमानवीय चरित्र को सभी अपने स्तर पर और अपने भीतर महसूस नहीं करेंगे तब तक एक अकेले व्यक्ति का उत्साह और उमंग तो इसी तरह निराशा में बदल ही जायेंगे ।हालात चाहे भूखमरी के हों ,या गरीबी के हों , हालात भले पाखंड के हों या प्रदर्शन प्रियता के हों , हालात चाहे लोकतंत्र के अधिनायक तंत्र की ओर मुड़ रहे हों , चाहे समाज मंहगाई और मोहताज (वंचित) बना झूझ रहा हो , हालात घर के भीतर के बिगड़ रहे हों , घर में बेरोजगारी और छंटनी ,खर्च और आमदानी का असंतुलन उभर रहा हो ।तब बदलाव के सब के सब मंसूबे धरे के धरे रह जाते हैं । यह आदमी की टूटन का दौर है । जो बाहर से नजर नहीं आती इस टूटन को महसूस करने के लिए संवेदनशील दृष्टि चाहिए ।मन की आंखें चाहिए ।आत्मा के बीच करुणा की आद्रता चाहिए । जब तक आदमी इस टूटन को अनुभूत नहीं करेगा तब तक यह केवल अकेले संवेदनशील मनुष्य का इरादा भर रहेगा लेकिन जब हालात से उठती मुश्किलों से आमना – सामना करने का संकल्प उत्साह और जोश के साथ घुल मिल नहीं जायेगा तब तक घर से निकलते कदम चाहे उत्साह और उमंग से बढ़ते जाते हों किन्तु आदमी के टूटते हौंसलों की दास्तान ही रहेंगे ।आदमी बदलाव चाहता है लेकिन सामार्थिक स्थितियां इतनी बदहाल है कि उन्हें केवल इरादों से नहीं बदला जा सकता ।बदलने के लिए समूचे समाज का बुनियादी वैचारिक ढांचा ही बदलना होगा ।समाज की टूटन का अहसास ही चेतना का स्फुरण है । समाज के हालात आदमी के काबू से बाहर हो चुके हैं ।इन बेकाबू होते हालातों से निपटना उन्हें बदलना अब आदमी के बस में नही ।उसके लिए आदमी को वैचारिक रुप से प्रखर होना होगा ।आदमी इन हालातों से संघर्ष करते हुए जिस तरह से टूट रहा है आत्मा के स्तर पर ,मन के स्तर पर , संवेदना के धरातल पर ,करुणा की आद्रता को खो रहा है जब आदमी के बाहर -भीतर अन्तर लय में नफरत ,हिंसा ,घृणा ने अपना आसन जमा लिया हो तब समाज के अन्दर उस मानवीय नैतिकता, संस्कार, भावना ,की स्थापना- प्रतिष्ठा बहुत ही दुरुह काम है ।आदमी के संकल्प हर बार रेत से टूटकर बिखर ही जायेंगे ।समाज को मानवीय मूल्यों , नैतिकता , ईमानदारी , सत्य , न्याय के हालात में लौटाने के लिए कृत संकल्प होने की जरुरत है ।
