Home आज की कविताडूबकर डूबा नहीं हरसूद-डूबकर डूबा नहीं हरसूद

डूबकर डूबा नहीं हरसूद-डूबकर डूबा नहीं हरसूद

by Dr. Vinita Raghuvanshi
डूबकर डूबा नहीं हरसूद
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ढोर -डांगर
गाड़ी -बैल
छेरा -छेरी
कुत्ता -कुत्ती पिल्लों सहित
बल्कि चिड़ियों चेनुओं के साथ
बढ़ा जा रहा काफिला हमारा
जिनके हरेक जन की कम्मर में
बन्धे जड़े गांवों के सपने
और ओख भर माटी अपने खेतों की
ताकि जहां भी बसें वहां —
बेडूब हरसूद की तरह फैला दें आसपास डटकर
और पल-पल ,सांस -सांस ,कदम -कदम
करते रहें महसूस यह कि
डूबकर डूबा नहीं हरसूद
जो
कि अब भी
पास है हरदम हमारे
देख रही सरकार
व्यवस्था की नजरों से उन सारे दृश्यों को
और घड़ियाली आंसू की स्याही से
पुनर्वास के पट्टों पर
आश्वासन लिखती
छपवाती इसी स्याही से
पुनर्वास के झूठे विज्ञापन
और बड़बोले भाषणों की झड़ी लगाये
सुख सपनों के
मर्मान्तक दृश्य देखती रहती
चाहे जहां से ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी की लंबी कविता —- ” डूबकर डूबा नहीं हरसूद ” से एक अंश उद्धृत )
आज की कविता नर्मदा के तटवासियों के विस्थापन की त्रासदी से उभरी उस पीड़ा का बयान है जब सरकार हरसूद के गांव ठिकानों को खाली करने के आदेश चस्पा कर रही थी और नर्मदा के जनवासी ,वनवासी ,निवासी अपनी पुश्तैनी जमीन -जायदाद घर मकान मन्दिर खेत खलिहान छोड़ कर हरसूद से बेठिकाना चल पड़े हैं ।जो जानदार हैं याने जो गाय भैंस बकरा बकरी कुत्ते बिल्ली तोते घरेलू पालतू हैं वे सब भी आदमी के असबाब के साथ सहेज लिए गये हैं या खुद ब खुद हरसूद छोड़ते जन समूह के पीछे चल पड़े हैं एक आस बंधी हुई है इंसान से इंसानियत की परिस्थितियां कुछ भी हो उनका अनुमान इन घरेलू पालतुओं को नहीं है लेकिन भरोसा है । दूसरी ओर भरोसा तोड़ती व्यवस्था ,शासन ,प्रशासन ,सरकार है जो निष्ठुर बनी केवल आश्वासन के पट्टे जारी कर रही है ।मुआवजा बांट रही है ।नर्मदा के तटवासियों को मीठे लहजे में उद्बोधन दिये जा रहे हैं । सरकार अपनी होशियारी और चातुर्य भरी मनुष्यता के किस्सों का प्रचार -प्रसार कर रही है ।जो जन हरसूद से विस्थापित हो रहे हैं उनकी कपड़ों में बन्धी उम्मीद और सपने ,कमर में खोंसकर रखी ओख(अंजुरी )भर माटी की वह दौलत ,वह सम्पदा समेट कर रख ली गयी है ।उस जमीन , उस खेत -खलिहान पर बिखेर कर हरसूद की गंध का अहसास पाने के लिए । बरसों बरस से अपनी जगह जमीन से जुड़ा लगाव ,अपनापन , आत्मीयता के घनघोर पलों की मिठास ,बिछोह ,किसी अपने को माटी में सुपुर्द कर या राख खारी में बदलते छोड़ जाने का दुख कितना भारी है ।सचमुच यह दुख कितना गहरा और मर्मान्तक है यह बस कल्पना के भीतर उतरकर ही महसूस किया जा सकता है ।मन की असल दौलत तो लगाव बुझाव ही होते हैं ।कोई पराया अपना कब बन जाता है यह पता नहीं होता उसकी कोई मूहूर्त और। शुभ घड़ी नहीं होती लेकिन जब वह मन आत्मा के आंखों की कोर पर आंसू बन सिमट आता है या कोनों को नम कर देता है तो वह अपना ही होता है । यह अपनापन हरसूद छोड़ते हर हरसूद वासी की मनोदशा ,मनोव्यथा का बयान है ।हरसूद छोड़ते हर व्यक्ति के भीतर अपना अपना हरसूद स्मृतियों में रचा बसा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता ।वह उन जगहों उन सरकारी पट्टों से मिली जगह जमीन को भी हरसूद की तरह बसा लेना चाहते हैं ।यह एक कोमल अनुभूति ही मानी जा सकती है जिसमें हरसूद की स्मृतियां अतल गहराइयों तक निखरी -बिखरी हैं स्मृतियों में हरसूद लहलहा रहा है अटल सत्य है कि भावना की जमीन से मन में बसा हरसूद छूटा नहीं है इसीलिए तो कमर में ओख भर माटी समेट कर खोंस कर रख ली गई है ।यह मानव मन का अटूट भरोसा है कि वे जहां भी स्थापित होंगे वहां एक जीवंत हरसूद खुद ब खुद सांसें लेने लगेगा ।हरसूद तब तक प्राणवान है जब तक वह उसके बाशिंदों में आत्मानुभूति बन कर संचरण कर रहा है ।हरसूद वासियों का दृढ़ संकल्प ही कहीं भी हरसूद को पुनः सृजित कर सकता है ।उन तट वासियों,निवासियों में ,नर्मदा वासी में लोक रीति के रीति- रिवाज उन सामाजिक लोक व्यवहार का पालन ,मानवीय चेतना जब तक प्राणवान है तब तक हरसूद भी कभी नहीं डूब सकता । 🙏विनीता रघुवंशी

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