Home आज की कवितापहाड़ से बातचीत-पहाड़ों के बीच

पहाड़ से बातचीत-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
पहाड़ से बातचीत
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पहाड़ !
तुझे पर क्या टूट पड़ा है
कि तेरी चट्टानें
पहले से ज्यादा
भयावह लगने लगी हैं
इनके इर्द गिर्द और ऊपर
संतरियों —– से खड़े पेड़
कुल्हाड़ियों की —-
अदाकारी में मारे गये
तुझ पर
क्या टूट पड़ा है आखिर ?
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में पहाड़ से छीनी जाती हरियाली और घने जंगल के विनाश की चिन्ता समाई है ।
आज विकास के नाम पर जिस तरह पहाड़ों को ढके जंगल काटे जा रहे हैं वह मनुष्य के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है । पर्यावरण की दृष्टि से भी यदि विचार किया जाये तो यह बेहद चिंतित कर देने वाले हालात ही हैं कि पेड़ों को काट काट कर रास्ते बनाये जा रहे हैं , कालोनियां और नगरों का विस्तार किया जा रहा है सड़कें ,रेल मार्ग,हवाई अड्डे बनाये जा रहे हैं ,पहाड़ों को समतल मैदान में बदला जा रहा है ।आदमी की यह भौगोलिक उपलब्धि आदमी के लिए ही जीवन घातक है ।पहाड़ से धरती का संतुलन बना रहता है ।भूकम्प और तूफान थमे रहते हैं ।पहाड़ प्रकृति ,धरती ,और वायुमंडल को ऋतु परिवर्तन सर्दी गर्मी धूप हवा के चलन। सक्रिय करता है ।यदि पहाड़ नहीं होंगे तो समुद्र अपनी सीमाओं में नहीं रहेगा ,यदि पहाड़ नहीं रहेंगे तो नदियां स्वच्छ नहीं रहेगी ‌धरती से जल प्रपात के नजारे खत्म हो जायेंगे।क्या धरती की ऊंचाई और समुद्र की गहराई का पैमाना नहीं बचेगा ।पहाड़ इन दिनों जिस तरह से विकास ,विस्तार के नाम पर नेस्तानाबूद किये जा रहे हैं एक दिन आदमी भी पहाड़ की तरह ही नेस्तानाबूद हो जायेगा ।इस आधुनिकता के चक्रव्यूह में फंसा इंसान अपने नदी पहाड़ जंगल जमीन पेड़ पौधै सबके प्रति असंवेदनशील और घनघोर लापरवाह हो गया है ।वह जिस भेड़िया धसान का शिकार है उससे वह आसानी से बाहर नहीं आ सकता ।उसकी कुल चिन्ता अपने आपको लेकर है लेकिन वह जीवन चक्र को लिए प्रकृति पहाड़ पेड़ पौधे के महत्व को भूल गया है ।ये प्रकृति के सौन्दर्य वर्धक उपादान ही मनुष्य के आसपास जिस पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं उसी से पृथ्वी पर जीवन की संभावना बनती है ।यह पारिस्थितिकी तंत्र ही पृथ्वी पर प्राणी मात्र के जीवन को ऋतुओं के परिवर्तन को गर्मी सरदी बसंत हेमंत शिशिर शरद के स्वागत ,आगमन,और बिदाई का अहसास कराता है । अनुमान कीजिए यदि धरती से पहाड़ों का अस्तित्व नष्ट हो जाये तो मानव के अहंकार का कद कितना बढ़ जायेगा ? उसकी प्रतिध्वननियो से धरती आकाश हर हमेशा गूंजता ही रहेगा एक पहाड़ ही है जिससे ध्वनियां टकराकर वापस लौटती रहती है और मानव मन के अहंकार का शमन हो जाता है । पृथ्वी पर कोई है जिसका कद पहाड़ के सामने छोटा है ।इस तरह के ऊंचाई का गहराई का पैमाना बने पहाड़ यदि काटे जायेंगे ,उन पर पहरा देते आसमान ताकते पेड़ यदि कुल्हाड़ी की कलाबाजी ,हुनर बाजी में धराशायी किये जायेंगे तो यह धरती के अस्तित्व से ही जुड़े नहीं है पहाड़ मनुष्य और यहां तक की प्राणी मात्र का जीवन संकट ग्रस्त हो जायेगा ? मनुष्य पहाड़ नष्ट करके बहुत बड़ी भूल कर रहा है ।आज पर्यावरण की चिन्ता की जा रही है लेकिन पहाड़़ से बातचीत नहीं हो रही है ।उसका ख्याल नहीं रखा जा रहा ।पेड़ जरुरी है , नदियां जरुरी है ,हवा जरुरी है , मैदान जरुरी है ,सूरज जरुरी है , अन्न जरुरी है सब जरुरी है उसी तरह पहाड़ भी बेहद जरुरी है ।आंधी और सूखे तूफ़ानों को रोकने के लिए मनुष्य सबकी चिन्ता फिक्र में हलाकान है पर पहाड़ को बचाने के लिए फिक्र मन्द नहीं है ।जबकि पहाड़ है तो धरती सौन्दर्य शाली है ।पहाड़ पर्वत बचा कर हम धरती के चिर यौवन मय सौन्दर्य को भी बरकरार रख रहे हैं ।हमारी सीमाएं और संप्रभुता सब सुरक्षित हैं । 🙏विनीता रघुवंशी

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