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फौलाद की तरह-आंगन बुहारते वक्त

by Dr. Vinita Raghuvanshi
फौलाद की तरह
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बाबा के बनाये घर को
घर बनाये रखा
पिता ने ता -उम्र
कोशिश तो मैं भी करता रहा यही
लेकिन बेटे ने
मलवा तक बेंच दिया
और पोता जो बनवा रहा उसकी जगह
फौलाद की तरह पक्का है
जिसे जहां से भी ठोंककर देखो
ठन – ठन बजता है —मकान की तरह ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में पीढ़ियों के वैचारिक बदलाव को रेखांकित किया गया है ।घर आदमी की पहली जरुरत है । जहां वह अपनी हर हसरत को एक रुप में ढालता है ।सुरक्षा की निश्चिंतता से जीवन गुजारने की कोशिश करता है ।घर में जो बदलाव चेतना का हो रहा है वह मामूली नहीं है ।घर और मकान की चेतना में जमीन आसमान का अन्तर होता है ।घर बनता है सहज आत्मीयता ,लगाव ,अपनेपन से परिजन और परिवार से रिश्तों,इष्ट मित्रों से अतिथि और मेहमानों से चिड़िया चुनमुन की चहक से और गाय बैल ढोर ढांगर की रम्हाट से ।कबीर की बानी में कहें तो —-“सांई इतना दीजिए ,जा में कुटुम्ब समाये ।
मैं भी भूखा न रहूं ,साधु न भूखा जाये ।।”
घर की आत्मा में कबीर के कुटुम्ब का अर्थ समाया रहता है । सब मिल कर घर बनता है । पूर्वजों द्वारा जिस घर को बसाया जाता है उसमें यही अपनेपन की अनुगूंज , अनुभूति हर समय अपने हर काम काज में सुवास बन महकती रहती है लेकिन पीढ़ियों के बदलने से इस घर की आत्मा में भी , व्यवहार में भी , वैचारिक धरातल में भी धीरे – धीरे खुदगर्जी , स्वार्थ, लाभ ,लोभ की चेतना व्यवहार में उभरने लगती है ।बाबा की बसाई गृहस्थी ,घर को अगली पीढ़ी के उत्तराधिकारी बने पिता घर को घर बनाये रखते हैं लेकिन पीढ़ियों के बदलने को रोका नही जा सकता और ना ही घर के उस आत्मीयता ,अपनेपन के बोध को समझ को ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जस का तस स्थापित ही किया जा सकता है ।हर पीढ़ी के बोध ,अनुभव , अनुभूति का स्तर , संवेदनशीलता, व्यवहार की पारस्परिक संबंध निर्वाह ,लोभ ,लालच , आदि में अन्तर आता रहता है । इसलिए घर की आत्मा का यथावत वैसे का वैसा दीर्घ काल तक बना रहना संभव नहीं हो पाता या यों कहें कि पीढ़ियां अपने आसपास के वातावरण , परिवेश से भी प्रभावित होती है ।शिक्षा की उस पध्दति का भी असर उन पर पड़ता रहता है जिस के सांचे में ,माहौल में उनका वक्त व्यतीत होता है ।यह भावनात्मक मनोविज्ञान का सबक होता है ।यदि बचपन उदारता , सात्विक ,सादगी के बीच पलता – बढ़ता है तो उसकी चेतना उसकी भावनात्मक दृष्टि लगाव आत्मीयता ,अपनेपन से सम्पन्न रहेगी । पीढ़ियों के मानसिक गठन में शिक्षा ,माहौल , परिवेश और परिवार की मूल प्रवृत्तियों का भी असर शामिल रहता है ।दादा -परदादा घर की आत्मा को प्यार ,आपसी प्रेम से लथपथ रख पाते हैं लेकिन बेटा अपनी खुदगर्जी और धन लोलुप वृत्ति को नियंत्रित नहीं कर पाता वह घर का मलवा तक बेंच कर पैसा कमाना चाहता है और पोता मकान को मजबूत ही नहीं वरन फौलादी बना रहा है जहां से हवा भी गुजरे तो बिना पूछे ना गुजर सके । यह है अन्तराल समय का सोच का विचार का अब घर नहीं चाहिए हंसता खिलखिलाता चहकता आव -भगत और सेवा- सत्कार में जुटा ।अब मकान चाहिए अपने अकेले के लिए ।अपने सर छुपाने के लिए जिसमें हर कोई की आवाजाही ना हो सके ।जो सिर्फ खुद की आवाजों से ठन -ठन गूंजता रहे ।जिसमें साझा कुछ न हो ।सब खुद का केवल खुद में ही गूंजता सन्नाटा भरा मकान हो। ।यह अनुदार मनोवृत्ति का ही प्रमाण है कि मनुष्य इतना ज्यादा असहनशील हो चुका है कि वह किसी के साथ अपने को बांटना नहीं चाहता ।न धन न मन न आत्मा न अनुभूति बस अपने संकुचित परिवेश में अकेला भटकता हुआ प्रेत समान । क्या यह आदमी का भयावह रूप नहीं है ? यह अकेले हो जाने का बोध एक खतरा नहीं है ? यह भी सवाल खड़ा होता है कि जब वह कुछ साझा करना ही नहीं चाहता तो फिर यह आपाधापी वाली भागदौड़ क्यों और किसके लिए ? धन और संपत्ति का संग्रह किसके लिए ? आदमी से पूछा जाना चाहिए कि यह भागना ,यह अशान्ति ,यह अधपेट खाना और अर्धनिद्रा शयन क्यों ? यह खुद ही खुद की गुलामी में कैद क्यों ? यह आधुनिक मनुष्य की सबसे भयावह त्रासदी है ।यह आदमी का खुद के आसपास बोया गया बीहड़ है जहां वह आत्मतुष्ट नहीं वरन विकल है । कामनाओं और इच्छाओं के बीच भूखा प्यासा भटकने को विवश हैं ।वह मकान की चारदीवारी में रह रहा है और जीवन की शुष्कता का हामी है । कविता आदमी को आगाह कर रही है कि इससे आगे आदमी के करीब केवल और केवल विक्षिप्तता है ।बचना है तो बस एक ही विकल्प है वह है मकान को घर बना लेने का ? यह वैचारिक बदलाव ही उसे बचा सकता है ।आदमी के लिए आज आदमी की यह मनःस्थिति ही एक जबरदस्त आयुध बन चुकी है ।इस विस्फोटक अवस्था से बाहर आने के रास्ते तो खोजना ही होंगे ।आज आदमी सर्वसुविधायुक्त घर बनाते बनाते उसे होटल की तरह बनाता है जिसमें पारिवारिक माहौल नहीं पनपता वह खुद के घर में अतिथि सा आचरण करता मिलता है ।
🙏विनीता रघुवंशी

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