Home आज की कवितासंकल्प —२-पहाड़ों के बीच

संकल्प —२-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
संकल्प —२
***********
थकी हुई
इन लोहित शिलाओं ने
टोंक कर
समय नहीं पूछा कभी
जबकि रात- दिन
अपनी -अपनी कलाइयों पर
दमकती हुई घड़ियां बांधें
दिशाओं के कंधों पर चढ़ कर
आसमान का
रंग बदलने में लीन हैं
दिन के उजाले में ये
मायूसियों की
गहरी केंचुलियां पालती रहीं
कोई भी सूरज
इनके मन को नहीं छू सका
रात के अंधेरे में
अपनी फटी बिवाइयों पर
थकावट की
खुरदुरी
हथेलियां फेरती रहीं हैं वे
कोई भी चांद पिघल कर
इनकी पगथलियों का
अनुलेपन नहीं बन सका
लो !
इन शिलाओं को
सिर पर उठाये अब
हवाओं को चीरता हुआ मैं
इन्हीं की
अपनी संजीवनी से
इनकी मूर्च्छा भगाने को
निकल पड़ा हूं
आज !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में संकल्प का वह सिलसिला है जिसमें मेहनत कश व्यक्ति की निरंतर कर्म में लगे रहने की वृत्ति को रेखांकित किया गया है ।जो आदमी नित्य ही काम में डूबा हुआ है और उसमें उसे ऊब नहीं होती ।वह इन सबका आदि हो चुका है ।वह समझ रहा है कि उसकी कर्मशीलता ही संसार में बदलाव को ला सकती है । वह अपनी धुन में बंधा काम और काम में लगा है ।यह कर्मवृत्ति पूरे संसार में फैली हुई है और दुनिया का हर आदमी बदलाव लाना चाहता है इसीलिए काम में डूबा है ।ये सब श्रमजीवी हैं ,काम की धुन और लय में थिरकते रहे हैं इन्होंने कभी थम कर जिन्दगी के आराम की अनुभूति को अपने भीतर आने नहीं दिया ।इनके भीतर पलती इच्छाएं भले पूरी नहीं हो पाई पर इनकी काम की धुन और मेहनत का जज्बा उन उदासियों से बेअसर रहा ।हर इच्छा पर ये अपनी कर्म का आवरण डाल कर उसे पोसते रहे । किसी भी दिन इनकी अधूरी इच्छाएं , अधूरी कामनाएं ,मन की सहजता का आनंद के मौके के रुप में वह सूर्योदय नहीं हुआ ।ये श्रम शील मन के लोगों के भीतर वह उजाला नही आया जिसमें इनकी अपनी इच्छाएं पूरी हो सके इनके हाथ ,इनके पांव , इनकी भूख -प्यास और तृप्ति सब का अस्तित्व केवल दूसरों की इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए ही चलते रहे । इनकी ऊर्जा खपती रही दूसरों के सपनों के सृजन के लिए ।इन्होंने अपनी बुध्दि का उपयोग समर्पित कर दिया मालिक रुपी सत्ता के लिए ।रात के अंधकार में ये नित निरंतर अपनी खुरदरी हथेलियों से पगथलियों की बिवाइयों पर हाथ फेरती रही हैं यह चेतना ।बिम्ब की यह मार्मिकता बहुत ही करुणा से भरी है ।यह बखान करती है उस मजदूर उस मजदूरिन का जिन्होंने अपने श्रम को दूसरों के सुख के लिए खपा दिया है । कितनी मार्मिक पंक्ति है —कोई भी चांद पिघल कर / इनकी पगथलियों का / अनुलेप नही बन सका ” सच है आज तक मजदूरों के पक्ष में बहुत सारे नारे उछले बहुत सी योजनाएं बनाई गई लेकिन कोई कारगर बदलाव नहीं आ सका ।आज भी मजदूर का हक ठेकेदार अपनी जेब में निगल लेता है ।मजदूर काम करता है लेकिन हिसाब ठेकेदार रखता है ।और हर समय काम के हिसाब की रंग दारी में दबा मजदूर ही मजबूर बना रहता है ।यह मूर्च्छा ही तो है जो अपनी कर्मठता को नहीं समझते जो अपनी श्रम शीलता का सही मेहनताना नहीं आंक पाते ।हर बार पूंजीपति के काम दे देने को उपकार की तरह स्वीकार करते हैं यह चेतना उनके भीतर पैदा नहीं हो पाती कि जब तक वे मेहनत करते रहेंगे तब तक ही पूंजीपति वर्ग शोषक बना रहेगा ।यह चेतना उनके भीतर जागना जरुरी है कि बिखर कर नहीं वरन एक जुट रहकर ही वे पूंजीपति का सामना कर सकेंगे ।यह मूर्च्छा तो इन पर से हटानी ही होगी कि मेहनत करके ये पूंजीपति पर उपकार कर रहें हैं पूंजीपति इन्हें श्रम के बदले पैसा देकर उपकृत नहीं कर रहे हैं ।आज यह विचार अवश्य ही पनपना चाहिए कि श्रम की महत्ता है धन की महत्ता कमतर है । श्रम ,मेहनत ,कर्म की संजीवनी ही वैचारिक परिवर्तन ला सकती है केवल पूंजी के लिए किया गया श्रम कोई मायने नही रखता लेकिन श्रम का आधार ही है पूंजी ।बिना श्रम के धन का अर्जन नहीं किया जा सकता है ।श्रम ही संजीवनी है बिना मेहनत के संसार किसी भी बदलाव को हकीकत में नहीं बदल सकता है ।मेहनत के तीन प्रकार होते हैं एक श्रम से यह बुनियादी प्रकार है ।दूसरा पूंजी द्वारा ।तीसरा बुध्दि द्वारा ।इन सब में सबसे कारगर जो श्रम है वह शारिरिक श्रम है ।बिना इसके दोनों श्रम महत्व हीन है । संसार में जो कुछ भी महत्वपूर्ण बदलाव हुए या किये गये वह शारिरिक श्रम के कारण ही आये हैं ।बुध्दि बल और धन बल तो तन बल के अधीन ही है । इसीलिए कहा गया है –श्रमेव जयते ।
🙏विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More