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विनीता रघुवंशी
अपने ही आयुधों से
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अपने आप मूक होता
गालियां बकने वाला एक दिन
एक दिन लुप्त हो चुकी होती
वाणी उसकी
पश्चाताप से भरी आंखों की
भाषा ही बचती उसके पास
तब इस लायक भी नहीं होता
कि खुद को ही
धिक्कार सके वह
अपने ही आयुधों से लहुलुहान
घावों पर पट्टी की याचना करता
जब भटकता फिरता
तो उसे —–
बन्द दरवाजे ही मिलते घर – घर ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में गहरी सहनशीलता और अपशब्दों की व्यर्थता पर विचार किया गया है ।कई मर्तबा ऐसा होता है कि अज्ञान में उलझा व्यक्ति मन स्थिति यों का सही -सही अनुमान नहीं कर पाता और जो बेहद नजदीक और करीब होता है उसी पर अपने अपशब्दों से भड़ास निकाल देता है ।दोषी करार देता है ।अपने हालात ,अपने नुकसान या हानि या अपने विचारों से असहमति रखने वालों के प्रति वह गालियां बकता है ।ताने और तंज कसता है , उपहास उड़ाता है । लेकिन यह स्थिति लम्बे समय तक नहीं रहती हर बार हालात बदल जाते हैं , स्थितियां परिवर्तित हो चुकी होती है एक दिन उसकी बोलती बन्द हो जाती है । दोषारोपण का भाव गायब हो जाता है लेकिन किसी को भी गरियाते गरियाते वह व्यक्ति से अपना मित्र भाव खतम कर लेता है । दुश्मनी भले ही जम के की जाये लेकिन इतनी गुंजाइश जरुर रखनी चाहिए कि जब कभी दुश्मनी के भाव बदले तो शर्मिन्दा ना होना पड़े ।इस कविता में इस से आगे के अनुभव की बात उठाई गयी है याने जब वाणी के पास के अपशब्द , गालियों वाले हालात बदले और मित्र बनने के मौके आये तब आंखों में केवल पछतावा ही भरा हो और खुद ही खुद को धिक्कार ना सके ।आदमी को अपनी हरकत अपनी करतूत पर इतना तो विचार तय रखना ही चाहिए कि वह अपने अहम अपने अमानवीय व्यवहार के लिए खुद को फटकार लगा सके ।खुद का जमीर इतना जागृत अवस्था में हो कि किसी दूसरे को फटकारने या हकीकत को समझने समझाने की जरुरत ना पड़े ।खुद ही आत्म चेतन हो कि यह जाने समझे कि व्यक्ति का व्यक्ति से परस्पर व्यवहार ,दोस्ती ,प्रेम ,या मित्रता का होना चाहिए और अपने अमानवीय व्यवहार के प्रति स्वयं चेतनावान हो । अहंकार ही वह भाव है जो मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है , पराया करता है ।आदमी की आत्म मुग्ध अवस्था ही वह कारक है जो गालियों के जरिए समाज में शत्रु बना देता है । समाज में स्थितियां और हालात माहौल तो नित्य ही बदलते रहते हैं ।शत्रु मित्र और मित्र शत्रु बन जाते हैं । आदमी की चेतना ही वह तत्व है जो आदमी को खुद की नजरों में कभी गिरने नहीं देती ।यह आदमी की खुदगर्जी का ही नतीजा होता है कि समीप से समीप रिश्तों को भी वह अजनबी और पराया बना लेता है और इस तरह उसका अहंकार केवल बन्द दरवाजे ही बनाता चलता है ।आदमी को चाहे गहरे सरोकार या रिश्ते न मिले पर समाज की सहानुभूति से भरे खुले द्वार तो मिले ।समाज की सहज स्वीकृति ही मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पदा होती है । जिन आयुधों से अर्थात गालियों से जिस संसार का निर्माण किया गया होता है बाद में समाज भी उन्ही को उस अहंकारी मनुष्य को सौंपता है ।यह बेहद विचारणीय है कि आदमी के सामाजिक संबंध हर हमेशा आत्मीय और लगाव भरे होने चाहिए ।जिस स्तर के हमारे संबंधों के व्यवहारिक आदान -प्रदान होंगे वही हमें समाज से लौटाए जायेंगे ।नफरत के बदले नफरत और प्यार के बदले प्यार ।अब तय हमें करना है कि हमें नफरत चाहिए या प्यार ,लगाव, आत्मीयता ।
