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पहल-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
पहल
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खिलखिलाती धरती जब
सकते में आती
तो उसके चेहरे पर दूर -दूर तक
रेत कंकर या भाटों –सई
झांइयां उभर आती
ओ पथरीली जमीन
तेरे चेहरे पर सधे
इस सांवले बसन्त को
सुबह के साथ —
देखना चाहता हूं मैं
तेरे चेहरे को
सूरज का आईना बनाने का इरादा लेकर
निकल रहा हूं अपने घर से
पहली —पहली बार ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में धरती पर व्याप्त भय का वातावरण और उसमें दुबकी जन की खिलखिलाहट का अनुभव साझा किया गया है ।धरती का सकते में आना कितना गहरा बिम्ब है । वह कौन सी स्थिति है जब धरती हंसना भूल जाये ? लोक को मायूसी घेर ले ? भूख का हाहाकार जब चारों दिशाओं में गूंजने लगे ? या राजा पर साम्राज्य बढ़ाने की लालसा जाग जाये ? या निरंतर युद्ध की ज्वाला में देश को झोंक दिया जाये ? या यह वह अनुभव और अनुभूति हो जहां आदमी की आजादी पर एकाएक सत्ता कब्जा जमाने लगे ? कानून और नियम आदमी पर बन्दिशों का जाल कसने लगे ? या आदमी के मन – मस्तिष्क पर गहरा असर डाला जाये ? वैचारिक प्रचार -प्रसार का संकीर्ण मनोभाव फैलाया जाये ? या उत्सव के नाम पर उन्माद और उच्छृंखल माहौल बनाया जाये ? तब शायद तब धरती सकते में आती है ? तब धरती की उत्फुल्लता भयभीत होकर आसरा ढूंढती है । जब धरती का आनंद डर की अनुभूति करता है तो उसमें सख्ती की रेत कंकर और पत्थर सी स्याही भरा सांवला रंग उभर आता है । यहां यह प्रशंसा की बात है कि डर के कारण चेहरे पर आती स्याह पर्तों भरी झांइयां गहरे अनुभव का प्रमाण है । कविता में केवल शब्दों का चयन ही मायने नहीं रखता वरन अनुभूति की गहरी समझ भी बहुत मायने रखती है जो चेहरे पर स्याही भरी झाइयों को बिम्ब के रुप में इस्तेमाल करती है । इस कविता में आई उपमा भी बेहद मनमोहक है सांवला बसंत वह भी पथरीली जमीन का ? पथरीली जमीन का अर्थ है जमीन खुरदरी है ।रोज रोज की मेहनत मशक्कत कठोरता और संघर्ष करती हुई अवाम का दृश्य है यह जो अपने जीवन की कठोरता और कठिनाई से भरी है । जहां बसंत ऋतु भी सांवली है ? यह सौन्दर्य का वह पैमाना है जो निहायत ही दरबार से अलग थलग वैभव और ऐश्वर्य के सुख साधनों से विलग है । यहां जनता के दुःख विहीन चेहरे को सूरज के समान दमकता हुआ देखने की इच्छा है ।सूरज का आईना बनाने का इरादा कितना कितना नेक और भला बन पड़ा है ।ऐसी शुभेच्छा ।कैसी हृदय स्पर्शी है ।सचमुच जिस दिन जनता के भीतर आत्म विश्वास ,चेतना , सत्य से उमगी राष्ट्र भक्ति जन्मेगी उस दिन उसका चेहरा सूरज का आईना होगा । सूरज सा दमकता जनता के चेहरे की कल्पना मात्र ही चेहरे पर छाये भय को पौंछ सकती है । जनता के दुःख कष्ट मय जीवन का कुल अनुभव और अनुभूति को महसूस कर लेना ही वह द्रवित भाव है जिसमें फंसी धरती की खिलखिलाहट को लौटाना जिसका ध्येय हो ।जिसका लक्ष्य हो ।यह पहल ही वास्तव में स्तुत्य है ।
🙏विनीता रघुवंशी

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