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विनीता रघुवंशी
बता देतीं
पचास साल बाद गांव आया
और लोगों से
अपने घर का पता पूछ रहा
गलियां होतीं तो
भर भर धूल उछालती
बता देतीं कूद -कूदकर ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में बदलाव के मायने के बीच से जो अजनबी पन बढ़ा है उसका संकेत दिया गया है ।आजादी के बाद जिस तरह का पश्चिमी करण और विकास का आदर्श हमारे समाज और सत्ता ने स्वीकार किया वह हमारी भौगोलिक सुविधाओं को तो बढ़ाता है लेकिन वह सामाजिक संबंध के बीच पारस्परिकता को कम भी कर देता है ।भारतीय समाज के भौतिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाई गयी ।गलियों को चौक -चौराहों से जोड़ कर उन्हें संकरे से चौड़ा कर दिया ।मोहल्ले बिखरे और काॅलोनियों में सिमट गये । जहां बसे लोग आपस में अजनबी और अनजान बन कर अपने- अपने घरों की चारदीवारी में बन्द हो गये ।यह अजनबी पन इतना बढ़ गया कि आदमी अपने भीतर ही भीतर सिमट कर अकेला कुण्ठा ,तनावों ,ग्रंथियों से घिर गया ।यह आदमी के लिए सबसे बड़ी त्रासदी थी जो उसे लघुतम रुप में सीमित कर गयी । संबंधों का वह कोरा -कच्चा पन और रुठना मनुहार , उलाहना , आत्मीय- मिठास ,बतकही , बतरस, किस्से और मजाक सब कहीं आधुनिक जीवन से कआफूर हो गये ।बस बचा रहा तो कालोनी निवासी होने की ठसक मेम , और साहब बन जाने की । पहनावा बदला ,चलन बदले , घरेलू पूजा पाठ की जगह बर्थडे और ऐनीवर्सरी के आयोजन आये । खान-पान बदला , केक, पेस्ट्री आ गयी। जब विदेशी सत्ता बिदा हुई तो वह अपने कुछ अवशेष भी हमारे समाज में छोड़ गयी और उसी के सूत्र थाम कर भारतीय संस्कृति ,भारतीय समाज , भारतीय ज्ञान की परम्परा सब किनारे करके अपने आप सब बदल देने में हम आगे निकल गये ।इस आधुनिकता की दौड़ ने हमको चारित्रिक रूप से पतन गामी बना दिया ।जो कुछ बेशकीमती था वह छोड़ कर हम केवल भूसे के मालिक और भोक्ता बन गये ।यह भारतीय समाज की निश्चेतन स्थिति है । जहां उसकी चेतना को पूरी तरह से खतम कर दिया गया और संवेदनाशून्य दशा में वह केवल नकल और अनुकरण के वश में भटकता हुआ अपने चेतन स्वरुप को ही वास्तविक मान बैठा है ।आज यह तो पूछा ही जा सकता है कि इस प्राणी जगत में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो सोच सकता है — अपने भूत ,अपने भविष्य, और वर्तमान पर ।फिर वह सोचे बिना ,जाने बिना,विचार किये बिना स्थिति,दशा ,अवस्था पर विचार या मत बनाये बिना किनारे से कैसे निकल सकता है ? यह अचरज की ही बात है ? जब कोई व्यक्ति लम्बे अर्से बाद गांव लौटा है गलियां पक्की सड़क बन चुकी है आदमी ने भौतिक प्रगति कर ली है ।आज आधुनिकता ने पहचान का संकट खड़ा कर दिया है ।आदमी की वल्दियत खो गयी है ।खानदान और कुनबे गुम हो गये हैं ।कुटुम्ब स्वार्थ और लोभ की भेंट चढ़ चुके हैं ऐसे हालात में बस बचा है तो सिर धुनता अकेला आदमी ? जिसे सब हालात का सामना करना है ? जोखिमें हैं ? और आदमी आदमी के बीच अनजाना पन है ? अजनबीयत है ? अपरिचय है ? बेभरोसा है ? आदमी को ही इस अजनबी पन के भीतर से पहचान की गलियां बनानी होगी जिनमें आत्मीय लगाव की धूल उछल रही हो ।मन का आपा खोय । उन गलियों में वह बचपन हो जो सबका पता जानता हो । जीवन औपचारिक तौर तरीकों से भरा ना होकर अपने पन वाला भरोसे भरा हो ।
