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विनीता रघुवंशी
आत्मा की देह हैं चीजें
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इतनी सगी होती चीजें
कि छूट जाने पर
टूट जाते लोग
मरने के बाद भी
जीवित रखती चीजें
पुरातत्व की तरह सदैव
चीजों की आत्मा नहीं
फिर भी —-
आत्मा की देह हैं चीजें
मिट जाता सब कुछ
फिर भी कार्बन से हीरे तक
रुपान्तरित होकर बनी रहती चीजें ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में चीजों की महत्ता पर विचार किया गया है ।जीवन में अनमोल क्या है -वस्तु या प्राणी का जीवन ? वस्तु से आदमी पहचाना जाता है या आदमी से चीजें पहचानी जाती हैं ।अक्सर आदमी के रोज उपयोग में आने वाली खास चीजें होती हैं जैसे चश्मा ,घड़ी ,छड़ी ,जूते ,टेबल आदि इत्यादि या बैठने की खास जगह कमरा ,कोना या दीवान तखत या कुछ खास खिड़की झरोखा ,या कोई और सामान ।हम हर समय अपने आसपास के परिवेश में मौजूद रहने के कुछ न कुछ सामान को चुन लेते हैं ।जैसे किसी पेड़ की छांव , चौपाल या चबूतरा ।जब जगह तय हो जाती है तो हम उसका नामकरण भी उसी पहचान के इर्द -गिर्द बना लेते हैं ।जैसे नर्मदा परकम्मा पर चलते यात्रियों को अक्सर याद रहती है माई की बगिया , दादाजी का लोटा या तकिया ,दादी का दुशाला और रेशमी रजाई ।जीवन में आदमी अपने आसपास एक भौतिक संसार चुनता और बुनता रहता है और उसी में अपने अस्तित्व को पूरी तरह सिमटा कर रख देता है जैसे वह वस्तु वह चीज यदि उसके पास ना रहे तो वह भी नहीं रहेगा ।कभी कभी तो मन में यह ख्याल आता है कि इन मामूली चीजों में ऐसा क्या है जो इनके लिए इतनी खास है ।इनका पूरा का पूरा वजूद जैसे इन्हीं चीजों में समा गया है ।ये इन्हें छोड़ कर इनकी जगह कुछ नयी चीज भी तो इस्तेमाल कर सकते हैं ।पर यह छोड़ देने का या उनसे अलग होने का ख्याल भी उन्हें विचलित कर देता है वे चीजें नहीं वरन प्राण के पर्याय बन जाती हैं ।उन दैनिक इस्तेमाल में आती चीजें लोग आत्मा में इस कदर बस जाते हैं कि उनसे अलहदा जैसे आदमी के जीवन की कल्पना भी बेमानी है । आदमी की पूरी अस्मिता का निचोड़ होता है चीजें । कई दफा सुनने में आता है कि अमुक व्यक्ति इस लिए दुनिया से बिदा हो गया कि उसकी जमीन किसी ने छीन ली ,हड़प ली या धोखा हो गया याने आदमी का सारा वजूद सिमट कर उस जमीन के टुकड़े में ही समाया था जिसके छिनने से प्राण भी छिन्न गये ।क्या वस्तु आदमी के जीवन को महफूज रखने के लिए इतनी जरुरी है ? चीजों से आदमी का जीवन जुड़ा हुआ तो होता है लेकिन चीजों को प्राणपण से जोड़ लेना बहुत ही असाधारण विचार है ।आदमी का समूचा वजूद आदमी जैसे किसी खास वस्तु ,व्यक्ति ,उपलब्धि के आसरे गुजारता रहता है और उसी में उसीको प्रसन्न ,खुशी के लिए या बस आत्मिक सुख मान लेता है । दुनिया की तमाम हलचल उसकी इस निष्ठा ,लगाव ,या आत्मिक सुख के बीच अवरोध नहीं बन सकती ।यदि कोई इस आत्म सुख को कोई बाधित करता भी है तो वह उसका सबसे बड़ा शत्रु हो जाता है ।यह भी सच है कि चीजों में कोई जान नहीं होती , उनमें कोई। आत्मा नहीं होती पर वे जिसकी आत्मा में समा जाती है उस व्यक्ति की समूची देह के भीतर से वह वस्तु झलकने लगती है ।कितनी सूक्ष्म अनुभूति है उस वस्तु मय संसार की जीवंतता की ।चीजें ही कभी कभी आदमी के इतनी भीतर समा जाती हैं कि उनके छूट जाने पर अधिकतर आदमी टूट जाता है ।बिखर जाता है ।उसका आत्म बल धुरी हीन हो जाता है ।कभी कभी आदमी विक्षिप्तता की अवस्था में रहने लगता है ।यह सब मानव मन की कमजोरी ही मानी जा सकती है या मन की सहज स्वीकृति वाली स्थितियां । चीजें इतनी दीर्घ कालिक भी होतीं है कि वे आदमी के मरने के बाद भी स्मृतियों में पहचान में बरकरार रहती है ।हर शहर गांव या नगर में घर में ऐसे हिस्सा ,चौक चौराहे आज भी मौजूद मिल जायेंगे जो समय के साथ मिटे नहीं जैसे तुल्ली चौक , बड़े गणपति ,बड़ वाला चौक , पीपल चौराहा , अकल चबूतरा , ये ऐसी अमिट पहचान है जो नाम चिन्ह हो गई ।समय गुजर जायेगा ।कोयला हीरे में ढल जायेगा प्रकृति, पर्यावरण,ऋतुओं , में बदलाव होता रहेगा ।लोग जन्मते रहेंगे ।आते -जाते रहेंगे । चीजों के रुप बदलते रहेंगे । चीजें हर काल हर दशा में हर अवस्था में आदमी की पहचान को बरकरार रखती रहेंगी । स्थान गांव शहर नगर चौक चौराहे घर मकान दुकान वस्तुएं अपना रुप- स्वरुप बदलती रहेंगी । आदमी का जीवन इन सबके बीच महफूज रहेगा और ये आदमी के भीतर हर समय हर काल में आत्मा की अन्तर लय में मौजूद रह कर आत्मलय का स्वर बन गूंजती रहेगी ।संसार भौतिकता का ही प्रमाण है । चीजें भौतिक सुख की पहचान का पैमाना भर है ।इनसे ना तो जीवन क्षय होता है ना लघु दीर्घ ।
